सेना का बंगला भी नहीं बचा सके

सेना का बंगला भी नहीं बचा सके
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सेना का बंगला भी नहीं बचा सके, मेरठ छावनी के माल रोड से सटे बीआई लाइन स्थित बंगला 45 आर्मी की जरूरत के मद्दे नजर जिसको हायरिंग किया गया था, मेरठ कैंट के अफसर उसको भी खुर्दबुर्द होने से नहीं बचा सके। दरअसल सेना को जब अपने कार्य के लिए छावनी स्थित किसी भी बंगले की जरूरत होती है तो उसके लिए एक पत्र डीईओ कार्यालय यानि रक्षा संपदा अधिकारी कार्यालय को भेजा जाता है। जानकारों की मानें तो जिस बंगले का ऊपर जिक्र किया गया है, उसकी जरूरत के लिए एक पत्र सेना की ओर से भेजा गया था,  जिसके बाद इस बंगले का एक बड़ा भाग रक्षा संपदा कार्यालय प्रशासन ने मूल आवंटी से सेना की जरूरत के मुताबिक हायर कर लिया था। अब इस बंगले की बात कर ली जाए तो जीएलआर में यह बंगला किसी बीएस कोहली के नाम से दर्ज है। उन्हीं से सेना के लिए हायर किया गया। संभवत यह कार्रवाई तत्कालीन एमईओ (तब डीईओ के बजाए एमईओ हुआ करते थे, एमईओ के स्थान पर डीईओ का पद 1980 के दशक में सृजित किया गया) 1956-60 में की थी। हायरिंग की एवज में एक तयशुदा रकम बंगला स्वामी काे दी जा रही है। यह बात अलग है कि वर्तमान में इस बंगले का सेना द्वारा कोई प्रयोग नहीं किया जा रहा है और इस समय इस बंगले में पर कैंट बोर्ड के वार्ड पांच के पूर्व सदस्य अनिल जैन का कब्जा है। कैंट बोर्ड के पूर्व सीईओ मसलन ज्योति प्रसाद के चार्ज से पहले सीईओ रहे नागेन्द्र नाथ के कार्यकाल में इस बंगले में बड़े स्तर पर अवैध निर्माण कराया गया था। अवैध निर्माण इतने बड़े स्तर पर हुआ कि इस बंगले का पूरा जुगराफिया ही बदल गया। बाउंड्री वाल ऊंची कर दी गयी। ताकि कोई एंट्री न कर सके। अवैध निर्माण को कभी भी न तो सीईओ कैंट कार्यालय न ही डीईओ कार्यालय स्तर से रोकने का प्रयास किया गया हो ऐसी कोई जानकारी नहीं है। हां यह बात अगल है कि पिछले दिनों संभवत नवंबर माह में डीईओ कार्यालय के स्टाफ ने एक नोटिस जरूर इस बंगले पर चस्पा किया था, नोटिस चस्पा किए जाने के बाद डीईओ कार्यालय स्तर से क्या कार्रवाई की गयी, यह भी स्पष्ट नहीं। लेकिन इतना है कि वर्तमान में कैंट बोर्ड के पूर्व सदस्य अनिल जैन जरूर इस पर काविज हैं। यहां बस इतना सा सवाल है कि जो बंगला सेना के लिए हायर किया गया है और उसकी एवज में कुछ रकम डीईओ कार्यालय से पे की जा रही है उस बंगले अवैध रूप से बताए जा रहे अनिल जैन कैसे ले सकते हैं। सुनने में तो यहां तक आया है कि डीईओ कार्यालय के स्टाफ ने कई बार इस बंगले में जाने का प्रयास किया लेकिन वो दाखिल नहीं हो पाए। उसके बाद ही संभवत नोटिस चस्पा किया गया है। इसके अलावा इस बंगले को लेकर एक फ्लोर मिल मालिक राजीव कुमार और अनिल जैन के बीच तनातनी बतायी जाती है। वह मसला अलग है, लेकिन सेना के लिए हायर किया बंगला बिक जाना जरूर कैंट प्रशासन के उच्च पदस्थ अधिकारियों की कार्यप्रणाली व ओल्ड ग्रांट के बंगलों को लेकर कैसी चौकसी की जा रही है इस पर सवाल खड़े करता है। सुनने में यह भी आया है कि राजीव कुमार ने बंगला 45 का आधा हिस्सा सरकार को सरेंडर कर दिया है।

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