गलत फैसला और हार का हार

नरेश-नरेन्द्र या फिर हरिकांत
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गलत फैसला और हार का हार, मेरठ नगर निगम महापौर के लिए प्रत्याशी के चुनाव को लेकर एक छोटे से गलत कदम की लंबी कीमत चुकानी पड़ सकती है। वहीं दूसरी ओर मेरठ के पंजाबी खासतौर से जट पंजाबी जिनकी संख्या ठीकठाक है, भी चाहते हैं कि उनकी सत्तर साला वफादारी का सिला मिलना चाहिए। पंजाबियों का दो टूक कहना है कि विधानसभा चुनाव उससे पहले लोकसभा चुनाव और न जाने ऐसे ही कितने चुनावों में भाजपा की हर बात मानी है। पाकिस्तान से आने के बाद कभी भी किसी दल की ओर मुड़कर भी नहीं देखा। नफा हो या नुकसान हमेशा भाजपा के साथ खड़े रहे हैं, इसलिए मेरठ नगर निगम महापौर के चुनाव में पंजाबियों की उम्मीद नहीं टूटनी चाहिए। पंजाबियों का साफ कहना है कि ठेठ जट पंजाबी प्रत्याशी चाहिए, किसी अन्य जाति के पंजाबी को यदि पंजाबी साबित करना या थोपने का प्रयास किया तो चुनाव परिणाम आने के बाद पछताने तक का मौका नहीं मिलेगा।  शहर के पंजाबियों खासतौर से पंजाबियों के नाम पर जो तमाम संगठन मेरठ में बने हुए हैं इस बार वो प्रत्याशी के सवाल पर पाला खींचे नजर आते हैं। उनका कहना है कि किसी अन्य बिरादरी वो चाहे कलाल हों या फिर कोई और पंजाबी का स्टीकर चिपका कर थोपने का प्रयास किया तो फिर पंजाबियों का दूसरे विकल्प चुनने में एक पल की देरी नहीं लगेगी। कलाल बिरादरी की हजार वोट भी नहीं, कलाल जाति से किसी को थोपा तो उस स्थिति में भाजपा के चुनावी रणनीतिकार चुनावी समर में केवल जीती हुई बाजी हारने के लिए ही उतरेंगे। वहीं चुनाव विश्लेषकों की मानें तो भाजपा के पास विपक्ष से नगर निगम में पुराना हिसाब चुकता करने का मौका है। भाजपा इस बार चुनाव में जट पंजाबी साथ ही किसी महिला प्रत्याशी को उतारकर,  विपक्ष खासतौर से जैसा की प्रचारित किया जा रहा है कि सीमा प्रधान को उतारने जाने की तैयारी है, उस रणनीति पर पानी फेर सकती है। वैसे भी यह भी कटू सत्य है कि यदि सीमा प्रधान मैदान में आती हैं तो भाजपा किसी गैर पंजाबी या पंजाबी का स्टीकर लगे प्रत्याशी को उतारने की चूक करेगी तो नुकसान के अलावा कुछ हासिल होने वाला नहीं। पहला नुकसान चुनाव का पूरी तरह से ध्रुवीकरण हो जाना है। सीमा प्रधान के चुनाव में आने से महिला मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भगवा खेमे से छिटकना तय है। इसलिए पहली प्राथमिकता पंजाबी ऐसा चेहरा हो पहचान का माेहताज न हो। भाजपा की मुसीबत केवल यहीं तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ी कीमत पंजाबियों की नाराजी को लेकर उठानी पड़ेगी। क्योंकि अनौचारिक बातचीत में मेरठ के तमाम बड़े पंजाबी नेताओं से जब भी बात की जाती है तो वो एक ही बात कहते हैं कि इस बार बारी भाजपा के वादा पूरा करने की है। साथ ही उनका यह भी कहना है कि स्टीकरण लगा मसलन दूसरी किसी जाति के शख्स को पंजाबी बताकर उतारा जाएगा तो मेरठ का पंजाबी समाज कंसीडर करना तो दूर की बात इस बार खुलकर विरोध करेगा। केवल पंजाबी होना ही काफी नहीं है, चुनावी चेहरा ऐसा भी हो जिसकी मुसलमानों में पहचान और पकड़ दोनों हो। क्योंकि इस बार मेरठ में भाजपा के लिए चुनाव आसान तो कतई नहीं है यूं कहने को कोई कुछ भी दावे करता रहे। महापौर का पिछला चुनाव इस बात का पुख्ता साबूत है। चुनाव में भाजपा के रणनीतिकारों के चलते ही प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा था। पंजाबी समाज का कहना कि उम्मीद है कि इस बार भाजपा पुरानी गलती दोहराने की गलती नहीं करेगी।

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