काम के बोझ के मारे मासाब बेचारे

काम के बोझ के मारे मासाब बेचारे
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काम के बोझ के मारे मासाब बेचारे, परिषदीय स्कूलों के मास्टर जी के कंधों पर सरकार ने बच्चों को पढाने के अलावा इतने काम लाद दिए है कि नौबत कंधों के टूटने की आ गयी है। सरकार की नीतियों व निर्णयों ने सरकारी स्कूलों के मास्टर जी को स्टेपनी बनाकर रख दिया है। जो कान किसी अन्य विभाग का कर्मचारी न कर सके वो गुरू जी को सौंप दो। जहां तमाम महकमों का स्टाफ हाथ खड़े कर दे। वहां बेसिक के स्टेपनी बन चुके गुरू जी को जबरन धकेल दो। मास्टर जी की जो हालत बना कर रख दी है उसके बाद यह समझ में नहीं आ रहा है कि वो बच्चों को पढ़ाएंगे कब। इस अभियान में लगे मास्टर जी दूर दराज के गांवों के अलावा शहर के स्लम इलाकों में बच्चों को स्कूल भेजने के लिए अभिभावकों से मिन्नतें करते देखे जा सकते हैं। लेकिन मुसीबत तो तब शुरू हुई जब स्वास्थ्य विभाग का काम भी लाद दिए।
पढाने के अलावा सब कुछ
प्रदेश में तमाम ऐसे विद्यालय हैं, जहां शिक्षकों की कमी है तो कई विद्यालयों में छात्रों के अनुपात में शिक्षक नहीं है। कुछ जगहों पर शिक्षामित्र ही तैनात हैं। ऐसे में जब उनकी ड्यूटी चुनाव में बीएलओ, बीएलओ सुपरवाइजर, मतगणना या अन्य काम में लगती है तो विद्यालय की पढ़ाई व्यवस्था ठप हो जाती है। यही नहीं, शिक्षकों से स्कूल चलो अभियान के अंतर्गत आउट आॅफ स्कूल बच्चों के चिह्नीकरण, पंजीकरण व नामांकन के लिए परिवार सर्वेक्षण भी शामिल है। यदि बच्चा किसी विद्यालय में नामांकित है तो कक्षा, विद्यालय के यूडायस कोड, आंगनबाड़ी केंद्र का कोड, विद्यालय/आंगनबाड़ी केंद्र का नाम और अगर स्कूल में नहीं पढ़ रहा है तो सात से 14 वर्ष की आयु के आउट आॅफ स्कूल बच्चों के लिए 23 कॉलम का अलग प्रोफार्मा भरेंगे। प्राइवेट स्कूलों का डाटा भी फीड उनसे कराया जा रहा है। इतना ही नहीं, कई बार शिक्षकों की ड्यूटी बच्चों को अल्बेंडाजोल (पेट के कीड़े मारने की दवा) की गोली खिलाने और दवा खाने से छूटे बच्चों का डाटा रजिस्टर मेंटेन करने में भी लगा दी जाती है। इसके अलावा भी कई अन्य कामों में ड्यूटी लगा दी जाती है।
अभिभावकों वाला काम भी
मास्टर जी को अब बच्चों के माता पिता या कहें अभिभावकों का भी काम अब सौंप दिया गया है। बच्चे यूनिफार्म, जूता-मोजा पहनकर स्कूल आए, यह भी शिक्षक को सुनिश्चित करना होता है। कई बार अभिभावक इस मद में मिलने वाली राशि दूसरे काम में खर्च कर देता है लेकिन इसकी जिम्मेदारी शिक्षक की तय की जाने लगती है। शिक्षकों को विद्यार्थियों को फोटो अपलोड करने का भी काम करना होता है। ये सब काम ऐसे हैं, जिन्हें न करने पर शिक्षक के खिलाफ कार्यवाही की तलवार लटकी रहती है।
कहीं टूट न जाए बोझ से कंधे
बेसिक के मास्टर जी के कंधों पर जितना बोझ लाद दिया गया है उसके बाद यह आशंका सताने लगी है कि काम करते-करते कहीं मास्टर जी के कंधे ही ना जवाब दे दें। पढ़ाई समेत अन्य कामों के अलावा मास्टर जी की जिम्मे संचारी रोग नियंत्रण अभियान का प्रचार-प्रसार, शिक्षक संकुल, विभागीय अधिकारियों की बैठक में शिरकत, पोलियो ड्रॉप पिलाने आदि के काम भी हैं। नाम न छापे जाने की शर्त पर अनेक टीचरों ने आरोप लगाया है कि शिक्षकों से एक दिन में एक साथ इतने काम लिए जाते हैं कि उन्हें बच्चों को पढ़ाने के लिए समय नहीं मिल पाता है। इसकी समीक्षा होनी चाहिए और तकनीकी कामों के लिए अलग से कर्मचारी तैनात होना चाहिए।
गाड़ी की स्टेपनी से ज्यादा कुछ नहीं
उप्र. प्राथमिक शिक्षक संघ के मेरठ के जिलाध्यक्ष राकेश तोमर का कहना है कि शिक्षकों की गलत छवि शासन के सामने प्रस्तुत की जा रही है। शिक्षकों की नियुक्ति की योग्यता पढ़ाई के अनुसार तय की गई है, लेकिन उनसे हर काम लिए जा रहे हैं। मिड-डे मील, रंगाई-पुताई तक के लिए निलंबित कर दिया जा रहा है। शासन को पढ़ाई का स्तर सुधारने के लिए इस व्यवस्था में बदलाव करना चाहिए। बेहतर होगा कि शिक्षक से केवल पढाई का काम लिया जाए।
यह कहना है बीएसए का
इस संबंध में जब बीएसए आशा चौधरी से बात की गई तो उनका कहना था कि यह तमाम बातें शासन स्तर से निर्धारित की जाती हैं, शासन का जो आदेश हैं उसका पालना करना व करना सभी कम दायित्व है।

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