काफी बदल गयी कांवड़ यात्रा

kabir Sharma
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हरिद्धार। पिछले कुछ सालों के दौरान मसल यह मान लीजिए की करीब बीस सालों के दौरान कांवड़ यात्रा का स्वरूप काफी कुछ बदल गया है। करीब चालिस से तीस साल पहले कुछ ही लोग कांवड़ लाया करते थे, लेकिनयह संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गयी। चालिस साल पहले से यदि अब की तुलना की जाए तो कई गुना यह संख्या बढ़ गई। कांवड़ यात्रा ने अब पूरे मेले का स्वरूप ले ले लिया है। इसके अलावा पहले डीजे और बड़े वाहनों जैसे अब किया जा रहा है, ऐसा कुछ नहीं होता था। इसके अलावा पहले हल्की कांवड़ लोग लाया करते थे, हालांकि वो चलन अभी भी है। इसमें हल्की कांवड़ के साथ आठ दस लोगों का जत्था चलता है। इनके साथ चार पांच अन्य लोग भी चलते हैं जो सुरक्षा के चलते हाथों में डंडे लेकर चलते हैं। हल्की कांवड़ लेकर चलने वालों का यह जथ्था लंबी दूरी तय करने के बाद ही विश्राम लेता है। वहीं दूसरी ओर इनका प्रयास होता है कि किसी शिविर में रूकने के बजाए यह जत्था वहां रूकता है जहां भोजन आदि की तो व्यवस्था होती है, लेकिन ये लोग उसका भुगतान करते हैं। शिविरों में भी यदि ये रूकते हैं तो वहां भी भोजन आदि के बाद जो भी वहां प्रतिमा होती है, वहां कुछ राशि दाम में देते हैं। इसके बाद कुछ भारी और डीजे के साथ कांवड़ का चलन शुरू हुआ। इसमें एक बड़े वाहन पर अलग-अलग झांकियां सजाकर उसके आगे ऊंची कांवड़ लेकर चलते थे। इस दौरान कुछ वाहनों पर कलाकर अपनी कला का भी प्रदर्शन करते थे। कुछ वाहनों पर डांस ग्रुप भी चलते थे, वो डांस ग्रुप जहां भी भीड‍़ हुआ करती वहां अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। ऐसे डांस ग्रुपों के साथ कुछ लोग दूर तक साथ-साथ चलते और पैसे भी दिया करते थे, लेकिन बाद में या कहें इस साल शारीरिक क्षमता दिखाने वाली यानी की भारी कांवड़ का चलन शुरू हुआ है। ये भारी कांवड़ लाना कोई आसान काम नहीं होता। भारी कांवड़ में दो युवक एक साथ कांवड़ उठाते हैं। इनके साथ-साथ अन्य युवक भी होते हैं, जो भारी कांवड़ उठाकर चलते हैं। ऐसी कांवड़ लेकर शिव भक्त काफी पहले आने शुरू हो जाते हैं, ताकि समय से शिवालय पहुंच सकें। हालांकि यह संख्या अभी कम है, लेकिन चलन ठीक ठाक है। इसीलिए कहा है कि कुछ सालों में कांवड़ यात्रा में काफी तब्दीली आयी हैं। इसके अलावा देश के कई राज्यों ने भी कांवड़ यात्रा को लेकर संवेदशनशीलता दिखायी है। ऐसे राज्यों में यूपी सबसे आगे है। योगी में योगी सरकार इसके लिए सबसे आगे है। यूपी में तो पुष्पवर्षा तक कांवड़ियों पर शासन की ओर से करायी जाती है।

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