वीवीआईपी कार्यक्रम में भीड़ के तौर पर शामिल होना, जनगणना, मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया समेत सारे काम गुरूजी के कंधों पर
लखनऊ । बच्चों की कमी के नाम पर सरकारी स्कूलों को मर्ज करने का फरमान जारी किया गया है, हालांकि प्रदेश व्यापी विराेध और संगठन में असंतोष के चलते फिलहाल इस काम पर रोक लगा दी गई है।मर्ज किए जाने के पीछे बड़ा कारण सरकारी स्कूलों में बच्चों का ना आना सरकार बता रही है। इस फरमान से इन स्कूलों के टीचर भी नाराज हैं, वहीं दूसरी ओर बात करें यदि स्टाफ की तो प्रदेश भर में हजारों ऐसे हैं स्कूलों को मर्ज किए जाने के बाद उनके लिए रोटी रोजी का संकट खड़ा हो गया है, क्यों कि जिंदगी का बड़ा वक्त तो उनका इन स्कूलों में अस्थाई स्टाफ के तौर पर गुजर गया। तमाम ऐसे लोग है जो उम्र की उस पायदान पर खड़े हैं जिनकी नौकरी की अर्जी कोई भी थामेगा नहीं। जिस उम्र में लोग रिटार्यड हो जाते हैं, उम्र के उस पड़ाव पर पहुंचने के बाद यदि सरकारी फरमान के बाद उन्हें घर बैठना पड़े तो परिवार के लिए रोटी रोजी का संकट खड़ा होना तो लाजमी है। लेकिन इससे बड़ा असंतोष तो उन टीचरों में जो इन सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। इस संवाददाता ने जब कुछ टीचरों से बात की तो उनका कहना था कि जितना भी वक्त मिलता है, उस वक्त में वो पढ़ाई कराने के साथ-साथ बच्चों को स्कूल तक लाने का भी पूरा प्रयास करते हैं। कुछ का कहना था कि पढ़ाने और बच्चों को लाने का वक्त ही कितना मिलता है। कोई भी वीवीआईपी आता है तो फरमान जारी कर दिया जाता है कि टीचरों को पब्लिक के रूप में कार्यक्रम में जाना है ताकि वीवीआईपी को लग सके कि काफी भीड़ उन्हें सुनने को आयी है, जैसा कि प्रदेश के सीएम योगी के कार्यक्रम में हुआ था। प्रदेश के सीएम ही नहीं जब कोई वीवीआईपी मेरठ में आते हैं, टीचरों व स्कूल के अन्य स्टाफ को ही भीड़ के रूप में पहुंचने के लिए आदेश दे दिए जाते हैं। केवल टीचर ही आंगन बाड़ी कार्यकर्ता और उनके जैसी दूसरे संगठनों से जुड़ी बहनों को भी भीड़ के रूप में पहुंचने का आदेश होता है। भले ही और कहीं जाए या ना जाएं लेकिन वीवीआईपी की रैली में जरूर शामिल होना होता है। इस प्रकार के आदेश अनिवार्य होते हैं। कई जगहों पर बुनियादी शिक्षा (बेसिक स्कूल) की स्थिति बदहाल है। विशेष रूप से सरकारी स्कूलों में, शिक्षकों की कमी, अपर्याप्त बुनियादी सुविधाएं, और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी जैसी समस्याएं आम हैं।
टीचरों का दर्द
इस संवाददाता से टीचरों ने नाम न छापे जाने की शर्त पर अपना दर्द साझा किया। उन्होंने बताया कि मेरठ पहुंचे सूबे के सीएम योगी ने कहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बेसिक शिक्षा विभाग के कार्यों की समीक्षा करते हुए कहा है कि मानक के अनुरूप ही स्कूलों की पेयरिंग की जाए। इस कार्य में अनियमितता बरतने वाले अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। बच्चों की पढ़ाई में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। सीएम बार-बार कह रहे हैं कि पढ़ाई में किसी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिए, लेकिन उन्हें कैसे बताया जाए कि पढ़ाई में बाधा के अलावा कुछ है ही नहीं। पूरे साल में बच्चों को पढ़ाने का वक्त ही कितना दिया जाता है। कभी कोई फरमान तो कभी कोई फरमान, जब बच्चों को पढ़ाएंगे ही नहीं तो फिर बच्चे सरकारी स्कूलों में आएंगे ही कैसे। पढ़ाई के अलावा सारे काम बेसिक के टीचरों से ही कराए जाते हैं। वीवीआईपी कार्यक्रम में भीड़ के तौर पर शामिल होना, जनगणना, मतदाता सूची, चुनावी प्रक्रिया समेत सारे काम टीचरों के जिम्मे ही तो हैं। पढ़ाने के लिए वक्त ही कितना दिया जा रहा है। बच्चे बढ़ाने की बात तो सभी करते हैं, लेकिन बच्चे तो तभी बढ़ेंगे जब बेसिक के स्कूलों में बढ़ाई को पूरा वक्त दिया जाएगा।
सरकार के भीतर भी कम असंतोष नहीं
बेसिक के स्कूलों को मर्ज करने के सरकारी आदेश के खिलाफ केवल विपक्षी दल और बेसिक के टीचर ही नहीं बल्कि सरकार के भीतर भी असंतोष कम नहीं है। प्रदेश के पूर्व दर्जा प्राप्त मंत्री सुनील भराला ने बाकायदा सीएम को पत्र भेजकर इस पर पुर्न विचार का आग्रह किया है। उन्होंने इस आदेश के साइड इफैक्ट भी बता दिए हैं और कहा है कि इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। इस आदेश को लागू किए जाने के केवल नुकसान होगा और कुछ भी नहीं। केवल सुनील भराला ही नहीं प्रदेश में अन्य जिलों में भी सीएम को पत्र भेजकर इस पर दोबारा से विचार का आग्रह किया गया है। इस मामले को लेकर हाईकोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया गया है। चहूं और उठ रहीं आवाजों को सीएम ने भी अनदेखा नहीं किया है। जिसके चलते फिलहाल इसके क्रियान्वयन पर बैरियर डाल दिया गया है।
मर्ज करने के बजाए ली जाए सुध
इस आदेश से प्रभावित होने वाले टीचरों का कहना है कि बेहतर तो यह होगा कि मर्ज करने के बजाए बेसिक के स्कूलों की सरकार सूध ले। बेसिक के तमाम स्कूल किराए के भवनों में चल रहे हैं। ज्यादातर भवन खस्ता हाल हैं, यहां तक की कुछ तो गिराऊ अवस्था में हैं। इन स्कूलों में बच्चियों व महिला टीचरों के लिए पिंक टॉयलेट तक नहीं हैं, जबकि पिंक टॉयलेट पहली जरूरत होती है, लेकिन ये भी नहीं है। तमाम स्कूल ऐसे हैं जहां पंखें तो दूर की बात है रहीं प्रकाश के लिए टयूबलाइट या बल्ब तक नहीं है। बच्चों को खुले आसमान के नीचे पढ़ाना पढ़ता है। जिन स्कूलों की छत गिराऊ अवस्था में उन स्कूलों में भी खुले आसमान के नीचे बच्चे पढ़ाए जा रहे हैं। कुछ स्कूल ऐसे हैं जहां डेयरियां चल रही हैं, उनमें गाय भैंसे बांधी जा रहीं हैं। स्कूलों को मर्ज करने से बेहतर है कि उनकी हालत में सुधार किया जाए। जब हालत सुधर जाएगी और टीचरों को पढ़ाने का भरपूर वक्त दिया जाएगा तो बच्चे निश्चित रूप से खुद ब खुद बढ़ जाएंगे। मर्ज करने की फिर जरूरत नहीं पड़ेगी।