वर्ष 1952 के राजस्व रिकॉर्ड में 17,099 तालाब दर्ज थे, अब 3,528 तालाब राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज, लेकिन सर्वेक्षण में केवल 1,944 तालाब ही मौके पर मौजूद
मेरठ में तालाबों पर अवैध कब्जों के लिए प्रशासन के अधिकारी पूरी तरह से जिम्मेदार माने जाते हैं। विभिन्न अदालती आदेशों और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) की टिप्पणियों से यह स्पष्ट होता है कि अधिकारियों की लापरवाही, उदासीनता और मिलीभगत ने इस समस्या को गंभीर रूप दिया है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (National Green Tribunal – NGT) और कभी-कभी उच्च न्यायालयों ने मामलों की सुनवाई के दौरान अधिकारियों के ढुलमुल रवैये और कार्रवाई न करने पर कड़ी टिप्पणियाँ की हैं। NGT ने बार-बार कहा है कि अधिकारियों की निष्क्रियता या उदासीनता से यह प्रतीत होता है कि वे इन कब्जों को रोकने में विफल रहे हैं, या अप्रत्यक्ष रूप से मदद कर रहे हैं।
जिम्मेदारी निभाने मेंकी टालमटोल
सरकारी अधिकारियों, विशेष रूप से राजस्व और नगर पालिका प्रशासन के पास सार्वजनिक भूमि (तालाबों सहित) की सुरक्षा और अतिक्रमण से मुक्त रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। उनकी ओर से कार्रवाई न करना या नोटिस जारी करने के बावजूद विध्वंस की कार्रवाई को अंतिम रूप न देना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है। कई मामलों में, अतिक्रमण की शिकायतें शुरुआती चरण में की गईं, लेकिन अधिकारियों ने समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की। इससे अतिक्रमणकारियों को स्थायी निर्माण करने का समय मिल गया।अदालती दस्तावेज़ों में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ मामलों में अधिकारियों का अतिक्रमणकारियों के साथ तालमेल या मिलीभगत (Collusion) होने का संदेह है, जिससे उन्हें अनुचित लाभ पहुँचाया गया।
सत्ताधारियों का खुला संरक्षण
कुछ मामलों में, स्थानीय जनप्रतिनिधियों या प्रभावशाली व्यक्तियों ने भी अवैध कब्जों को हटाने की सरकारी कार्रवाई में हस्तक्षेप किया है, जिससे प्रक्रिया धीमी पड़ गई या रुक गई। शहर के कंकरखेड़ा इलाका इसका सबसे बड़ा प्रमाण है जहां किसी वक्त में सरकारी जमीन जिसे पहाड़ी कहा जाता हे वो हुआ करती थी। अब पहाड़ी के नाम पर केवल अवशेष रहे गए हैं उनको भी भूमाफिया कब्जा रहे हैं। इसी तर्ज पर शहर के तालाबों पर कब्जे किए गए।
सुप्रीमकोर्ट और एनजीटी की फटकार
NGT ने मेरठ के जिला मजिस्ट्रेट और अन्य संबंधित विभागों को तत्काल कार्रवाई योजना (Action Plan) बनाने, अतिक्रमण हटाने और बहाली कार्य सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है, जिसकी समीक्षा राज्य स्तर पर मुख्य सचिव द्वारा की जानी है। कोर्ट और एनजीटी की लगातार चिंताओं के बाद भी प्रशासन के आला अफसर बजाए तालाबों को मुक्त कराने के बैकडोर से कब्जे करने वालों के मददगार बने रहे।
कभी इतने तालाब हुआ करते थे
वर्ष 1952 के राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, अविभाजित पाँच तहसीलों वाले क्षेत्र (जिसमें बाद में चकबंदी हुई) में कुल 17,099 तालाब दर्ज थे चकबंदी के बाद नए तालाबों के निर्माण के साथ कुल संख्या 21,947 हो गई थी। वर्तमान में, मेरठ जिले में लगभग 3,528 तालाब राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हैं। हालांकि, एक गैर सरकारी संगठन (NEER Foundation) द्वारा किए गए सर्वेक्षण में केवल 1,944 तालाब ही मौके पर मौजूद पाए गए, जिनमें से 715 स्थायी रूप से सूखे हुए थे। मेरठ शहर में कभी 12 तालाब हुआ करते थे, जिनके नाम पर कुछ इलाके (जैसे छिपी टैंक, सूरज कुंड) आज भी हैं, लेकिन अब शहर में एक भी जल निकाय मौजूद नहीं है, छावनी क्षेत्र को छोड़कर। राजस्व विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, मेरठ जिले में 631 तालाबों पर अवैध कब्जा किया गया है, जिनमें से 570 पर स्थायी निर्माण (मकान/इमारतें) हो चुके हैं।
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