ब्राह्मण रसोइये गंगू ने की थी गद्दारी

kabir Sharma
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साहिबजादों को सौंप दिया था मुगलों को, शाहदत की खबर सुनकर माता गुजरी ने त्याग दिए थे प्राण, हिन्दू राजा दे रहे थे गुरु गोविंद के खिलाफ मुगलों का साथ

नई दिल्ली/फतेहगढ़। गुरु गोविंद सिंह जी के ब्राह्मण रसोइये ने यदि गद्दारी ना की होती तो साहिबजादे मुगलो के हाथ ना पड़ते। उन्हें शाहदत भी ना देनी पड़ती। उस वक्त राजपूत भी मुगलों का सही साथ दे रहे थे। आनंदपुर साहिब की घेराबंदी कर ली गयी थी, जो हिन्दू राजा साथ देने का वादा करते थे बाद में उन्होंने ही मुगलों के प्रति वफादारी दिखा दी और हमला कर दिया।

जुल्म के आगे झुके नहीं

पूरी दुनिया में साहिबजादों की शहीदी पर कार्यक्रम किए जा रहे हैं। उन्हें याद किया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि साहिबजादों की शाहदत के पीछे ब्राह्मण रसोइये का लालच था। छोटे साहिबजादों – बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) और बाबा फतेह सिंह (7 वर्ष) की अद्भुत बहादुरी और बलिदान को याद कर रहा है। गुरु गोबिंद सिंह जी के इन छोटे बेटों ने मुगल जुल्म के सामने झुकने से इनकार कर दिया और अपनी आस्था के लिए जान दे दी। लेकिन इस शहादत की कहानी में एक काला अध्याय है – वह गद्दारी जिसने इन मासूमों को मुगलों के हवाले कर दिया।

मुगलों का साथ दिया हिन्दू राजाओं ने

1704 में आनंदपुर साहिब की घेराबंदी के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी को मुगलों और हिन्दू पहाड़ी राजाओं की सेनाओं ने कसम खाकर सुरक्षित निकलने का वादा किया। लेकिन वादा तोड़कर हमला कर दिया गया। सरसा नदी पार करते समय परिवार बिछड़ गया। माता गुजरी जी और छोटे साहिबजादे गुरु जी के पुराने रसोइये गंगू के साथ उसके गांव साहेरी (मोरिंडा के पास) पहुंचे। गंगू ने पहले तो उन्हें पनाह दी, लेकिन लालच में आकर मुगल अधिकारियों को खबर कर दी। उसने माता गुजरी जी के सामान में सोने की मोहरें देखी थीं और इनाम की उम्मीद में गद्दारी की।

ब्राह्मण गंगू ने करायी थी गिरफ्तारी

ब्राह्मण रसोया गंगू की सूचना पर मुगलों की फौज पहुंच गयी थी और माता गुजरी और दोनों साहिबजादों को गिरफ्तार कर सिरहिंद के सूबेदार वजीर खान के पास भेज दिया। ठंडे बुरज में कैद कर कड़की सर्दी में उन्हें तंग किया गया। वजीर खान ने लालच दिए, धमकियां दीं – इस्लाम कबूल करो तो राज-पाट मिलेगा। लेकिन छोटे साहिबजादों ने डटकर कहा: “हम सिख हैं, गुरु के बच्चे हैं, मौत से नहीं डरते।”

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दीवार में चिनवा दिया जिंदा

अंत में 26 दिसंबर 1704 को वजीर खान ने हुक्म दिया कि दोनों को जिंदा दीवार में चिनवा दो। दीवार बनाते-बनाते जब बच्चे बेहोश हो गए, तो उन्हें बाहर निकालकर शहीद कर दिया गया। माता गुजरी जी ने यह खबर सुनते ही प्राण त्याग दिए। ब्राह्मण रसोइये की यह गद्दारी और जुल्म की कहानी सिख इतिहास में अमर है। गंगू जैसे गद्दार की वजह से हुए इस बलिदान ने खालसा को और मजबूत बनाया। आज फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारा इस शहादत की गवाही देता है।

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