देश और दुनिया के पर्यावरणविद हैं चिंतित, सुप्रीमकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया, चीफ जस्टिस भी रहेंगे सुनवाई में शामिल, बड़ा सवाल क्या मिल सकेगी राहत
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने अरावली पर्वतों को लेकर उम्मीद की किरन दिखाई है। इससे देश और दुनिया के पर्यावरणविद खासे उत्साहित हैं। हालांकि यह उत्साह तब तक बेमाने हैं जब तक देश की सबसे बड़ी अदालत की तरफ से केंद्र सरकार को सख्त लहजे में कोई साफ संदेश नहीं दिया जाता। याद रहे कि दुनिया भर के पर्यावरणविद अरावली पर्वत श्रृंखलाओं को लेकर परेशान और केंद्र सरकार के रवैये से बेहद परेशान और चिंतित हैं। आरोप है कि मोदी सरकार अपने मित्रों के लिए अरावतली पर्वत श्रृंखलाओं के पर्यावरण से खिलवाड़ पर उतारू है। यह घटना पर्यावरण संरक्षण, विकास और कानूनी न्याय के बीच संतुलन की बड़ी बहस छेड़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि फैसला आने वाले सालों में खनन नीतियों को प्रभावित करेगा।
ये हुआ जिससे जगी है उम्मीद
अरावली पर्वत के पर्यावरण को लेकर जिस बात से पर्यावरणविदों की उम्मीद जगी है उसके पीछे सुप्रीम कोर्ट की उस स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो) सुनवाई की है, जो आज अरावली पर्वत श्रृंखला की नई परिभाषा पर हो रही है। पर्यावरणविदों की चिंताओं के बीच कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है, क्योंकि हालिया परिभाषा बदलाव से अनियंत्रित खनन और पर्यावरण क्षति का खतरा बढ़ गया है।
चीफ जस्टिस सूर्याकांत से राहत की उम्मीद
चीपु जस्टिस सूर्याकांत से इस मामले में राहत की उम्मीद की जा रही है।तीन जजों की विशेष अवकाश बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्या कांत शामिल हैं, इस पर सुनवाई कर रही है। नवंबर में कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की कमिटी की सिफारिशें स्वीकार की थीं, जिसमें अरावली हिल्स को 100 मीटर ऊंचाई वाले भूमिरूप के रूप में परिभाषित किया गया। लेकिन अब चिंता है कि इससे हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में बड़े क्षेत्र खनन के लिए खुल सकते हैं, जो जैव विविधता और जल संरक्षण को प्रभावित करेगा।