PSLV के मिशन क्यों हो रहे फेल

kabir Sharma
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PSLV को इसरो का ‘वर्कहॉर्स’ , PSLV अब तक कर चुका है साठ सफल लांचिंग, पूरी दुनिया में कायम किया है ISRO ने विश्वास

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानि इसरो के PSLV मिशन जो पूरे देश और दुनिया में भारत की अंतरिक्ष में भारत की बड़ी साख माने जाते हैं, उसके दो मिशन लगातार फेल होने से चिंता होना स्वभाविक है। इसको लेकर मंथन चल हरा है कि ISRO के PSLV मिशन अब क्यों एकाएक फेल होने लगे हैं। PSLV को इसरो का ‘वर्कहॉर्स’ कहा जाता है, जो तीन दशकों में 60 से अधिक सफल लॉन्च कर चुका है। लेकिन हाल की घटनाएं चिंताजनक हैं। मई 2025 में PSLV-C61 मिशन में थर्ड स्टेज मोटर में समस्या आई, जिससे रॉकेट अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच सका और सभी पेलोड्स नष्ट हो गए। इसी तरह, 12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 मिशन में भी थर्ड स्टेज में ‘डेविएशन’ देखा गया, जिसके चलते 16 सैटेलाइट्स (जिनमें EOS-N1 मिलिट्री सैटेलाइट और अन्य कमर्शियल पेलोड्स शामिल थे) को कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका। इसरो के चेयरमैन डॉ. एस. सोमनाथ ने मिशन के बाद कहा कि “थर्ड स्टेज की परफॉर्मेंस में विचलन के कारण रॉकेट अपनी गति नहीं बनाए रख सका,” जिससे पूरा मिशन विफल हो गया। ये असफलताएं PSLV की केवल छठी और सातवीं विफलता हैं, लेकिन लगातार दो होना चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गुणवत्ता नियंत्रण, सप्लाई चेन या तकनीकी अपडेट्स में किसी कमी का संकेत हो सकता है।

साल की निराशजनक शुरूआत

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए साल 2026 की शुरुआत निराशाजनक रही है। इसरो का विश्वसनीय रॉकेट पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) लगातार दो मिशनों में असफल हो गया है, जिसने न केवल 31 सैटेलाइट्स को खो दिया बल्कि संगठन की वैश्विक प्रतिष्ठा और भविष्य के अभियानों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। PSLV-C61 (मई 2025) और PSLV-C62 (12 जनवरी 2026) की असफलताओं ने इसरो को आत्मचिंतन के लिए मजबूर कर दिया है।

ये है चिंता की वजह

PSLV को दुनिया का सबसे विश्वसनीय लॉन्च व्हीकल माना जाता था, जिसने NASA, ESA और कई कमर्शियल क्लाइंट्स को आकर्षित किया। लेकिन दो लगातार असफलताओं से इसरो की छवि धूमिल हुई है। अंतरराष्ट्रीय क्लाइंट्स अब PSLV पर सैटेलाइट लॉन्च करने से पहले दोबारा सोचेंगे, जिससे कमर्शियल रेवेन्यू में कमी आ सकती है। उदाहरण के तौर पर, PSLV-C62 में शामिल विदेशी सैटेलाइट्स के मालिक अब मुआवजे की मांग कर सकते हैं, जो इसरो की साख को और प्रभावित करेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भारत की ‘मेक इन इंडिया’ स्पेस इनिशिएटिव पर सवाल उठेंगे।इसके अलावा जो बड़ा सवाल है वो यह कि प्रत्येक PSLV मिशन की लागत करीब 200-300 करोड़ रुपये होती है। PSLV-C61 और C62 की असफलताओं से कुल 500 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ, जिसमें सैटेलाइट्स की कीमत भी शामिल है। इससे इसरो का बजट प्रभावित होगा, और भविष्य के मिशनों के लिए फंडिंग में कटौती हो सकती है। साथ ही, बीमा क्लेम्स और जांच प्रक्रिया अतिरिक्त खर्च बढ़ाएगी। भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स, जैसे EON Space Labs, जो PSLV पर निर्भर हैं, अब वैकल्पिक लॉन्चर्स की तलाश करेंगे, जिससे घरेलू इंडस्ट्री को झटका लगेगा।

सबसे बड़ा खतरा

असफलताओं की जांच के लिए इसरो को PSLV प्रोग्राम को अस्थायी रूप से रोकना पड़ सकता है। थर्ड स्टेज की समस्या की गहन जांच होगी, जो महीनों लग सकती है। इन असफलताओं के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं, जो न केवल तकनीकी बल्कि आर्थिक, रणनीतिक और वैश्विक स्तर पर असर डालेंगे।

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