नेहरू जी थे तो मुमकिन था

kabir Sharma
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भारत से अंग्रेज सब कुछ लूटकर ले गए थे, आजादी के बाद बेहद दयीनय दशा थी भारत की, नेहरू जी ने रखी आधुनिक भारत की नींव

नई दिल्ली। आज कुछ बेवाेकूफाना जहनियत के लोग भले ही नेहरू जी के बारे में कुछ भी अनाप-शनाप बकते हों, लेकिन यदि नेहरू जी नहीं होते तो भारत की दशा किसी बेहद पिछड़े अफ्रीकी देश से भी बदत्तर होती। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंड़ित जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि नेहरू जी का मानना था कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि लोगों की आर्थिक और सामाजिक उन्नति है। उन्होंने कहा: “हम एक गरीब और पिछड़े देश हैं, लेकिन हमारी आशाएं बहुत बड़ी हैं। मेहनत से हम आगे बढ़ेंगे।” यह दौर चुनौतियों का था, लेकिन नेहरू जी के नेतृत्व में भारत ने मजबूत नींव रखी – जो आज दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्ति बन चुका है। 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया, जब संविधान लागू होकर देश औपचारिक रूप से एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया। लेकिन उस समय मुल्क की हालत बेहद दयनीय और चुनौतीपूर्ण थी। स्वतंत्रता के बाद देश विभाजन की त्रासदी, साम्प्रदायिक दंगे, शरणार्थी संकट और आर्थिक तबाही से जूझ रहा था।

नेहरू जी जानते थे मुल्क की आजादी का मतलब

पंड़ित नेहरू ने जब देश की बागडोर संभाली तो वह जानते थे कि आजादी का मतलब क्या है। यह वह दौर था जब भारत “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” के बाद भी कई सालों तक संघर्ष कर रहा था। नेहरू जी ने कई बार स्वीकार किया कि आजादी मिलने के बाद भी असली आजादी रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, जो उस वक्त दूर थी।

साल 1950 का भारत

पहले गणतंत्र दिवस के मौके की जब करें तो उस दौर के भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर थी, लेकिन उत्पादन बहुत कम था। प्रति व्यक्ति आय बेहद निम्न (लगभग 250-300 रुपये सालाना के आसपास) थी। भुखमरी और कुपोषण आम बात थी। देश तमाम चुनौतियों से जूझ रहा था। इनमें रियासतों का एकीकरण अभी पूरा नहीं हुआ था, कुछ क्षेत्रों में अशांति थी। खाद्यान्न की कमी के कारण आयात पर निर्भरता बढ़ रही थी। मुल्क में सामाजिक तौर पर जातिवाद, छुआछूत, बाल विवाह, दहेज प्रथा और महिलाओं की दयनीय स्थिति बरकरार थी। विभाजन के बाद लाखों शरणार्थी बेघर थे। रोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे थे। औद्योगिक आधार कमजोर था, कारखाने बहुत कम थे। बेरोजगारी व्यापक थी, खासकर शहरों में। औसत आयु मात्र 32-33 वर्ष थी। मलेरिया, टीबी, हैजा जैसी बीमारियां फैली हुई थीं। चिकित्सा सुविधाएं नगण्य थीं। महज बीस फीसदी ही लोग शिक्षित थे। उस वक्त पंड़ित नेहरू ने भारत को संवारा सजाया।

ऐसा था पंड़ित जी का दृष्टिकोण

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पहले गणतंत्र दिवस पर रेडियो प्रसारण के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि 26 जनवरी 1950 सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है – जहां हमने खुद को एक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। जिस संविधान को आज कुलचने या बदलने की बात की जाती है, पंड़ित नेहरू ने उस संविधान संविधान को देश की आत्मा बताया – जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गारंटी देता है। उन्होंने जोर दिया कि अब असली काम शुरू हुआ है – गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और असमानता से लड़ना। “हमने ट्रिस्ट विद डेस्टिनी पूरी की है, अब भारत निर्माण का समय है।” उन्होंने आह्वान किया कि हर भारतीय को मेहनत, अनुशासन और एकता से राष्ट्र निर्माण में योगदान देना होगा। उन्होंने कहा कि दुनिया बदल रही है, लेकिन भारत को अपनी सभ्यता और संस्कृति के साथ आधुनिक बनना होगा – विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और औद्योगीकरण पर फोकस। नेहरू जी ने युवाओं और महिलाओं से अपील की कि वे सामाजिक कुरीतियों (जैसे दहेज, बाल विवाह) को खत्म करने में आगे आएं। उन्होंने भविष्य की योजनाओं की बात की – जैसे पंचवर्षीय योजनाएं, बड़े बांध (जिन्हें उन्होंने “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा), शिक्षा का प्रसार और औद्योगिक विकास।

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