पूरी प्लानिंग से की गयी हत्या, गोडसे और आप्टे को सुनाई गयी थी फांसी की सजा, 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में गोडसे और आप्टे को फांसी दी गई।
नई दिल्ली। आजाद भारत के पहले आतंकवादी नाथूराम गोडसे ने योजनाबद्ध तरीके से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की थी। वह पहले भी कई बार हत्या की साजिश कर चुका था, लेकिन कामयाब नहीं हुआ। लेकिन 30 जनवरी का वो मनहूस दिन जब आतंकी नाथूराम अपनी साजिश में कामयाब हो गया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी , जिन्हें बापू के नाम से जाना जाता है, की शाम 5 बजकर 17 मिनट पर गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना दिल्ली के बिड़ला हाउस (अब गांधी स्मृति) में हुई, जहां गांधीजी रोजाना संध्याकालीन अंतरधार्मिक प्रार्थना सभा करते थे। हत्यारा नाथूराम विनायक गोडसे (उम्र 37 वर्ष, पुणे निवासी) ने पॉइंट-ब्लैंक रेंज से गांधीजी की छाती और पेट में तीन गोलियां दागीं। गांधीजी जमीन पर गिर पड़े और उनके मुंह से अंतिम शब्द “हे राम” निकले। कुछ ही मिनटों में उनकी मृत्यु हो गई।
प्रार्थना के लिए जा रहे थे बापू
हत्या के वक्त बापू प्रार्थना के लिए जा रहे थे। तभी भीड़ में से निकलकर गोडसे ने आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया और तुरंत अपनी बैरेटा पिस्तौल निकालकर तीन गोलियां चलाईं। हत्यारे गोडसे को भीड़ ने दबोच लिया और जमकर पीटा। भीड़ ने उन्हें पीटा, लेकिन अमेरिकी दूतावास के एक अधिकारी हर्बर्ट रीनर जूनियर ने उन्हें पकड़कर सुरक्षा कर्मियों को सौंपा।
हिन्दू महासभा से जुड़ा आतंकी
नाथूराम गोडसे हिंदू महासभा से जुड़ा देश का पहला आतंकवादी था। गोडसे का मानना था कि गांधी जी के द्वारा भारत के विभाजन में मुसलमानों की मांगों का अत्यधिक समर्थन करना। हिंदुओं के हितों की अनदेखी और “तुष्टिकरण” की नीति अपनाना। पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये की राशि देने का समर्थन (जो विभाजन के समय विवादास्पद था)। उसने गांधी जी को पाकिस्तान का पिता तक करा दिया। गोडसे ने कहा कि हत्या “पूरी तरह राजनीतिक” थी और उन्होंने गांधीजी को प्रणाम करके गोली मारी, क्योंकि वे उन्हें सम्मान देते थे लेकिन उनकी नीतियों से असहमत थे।
बापू की हत्या के पूर्व प्रयास
हत्या की साजिश में गोडसे के साथ नारायण आप्टे (मुख्य साजिशकर्ता), गोपाल गोडसे (नाथूराम का भाई), विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा आदि शामिल थे। 20 जनवरी 1948 को पहला प्रयास, मदनलाल पाहवा ने प्रार्थना सभा में बम फेंका, लेकिन गांधीजी बच गए। 30 जनवरी को गोडसे ने अकेले कार्य किया, लेकिन साजिश सामूहिक थी। कुल 8 लोग आरोपी बने
स्पेशन कोर्ट में मुकदमा
बापू की हत्या का मुकदमा लालकिले की स्पेशल कोर्ट मे चला। इसके जज आत्माचरण थे। 10 फरवरी 1949 को फैसला सुनाते हुए गोडसे और आप्टे को फांसी, बाकी को उम्रकैद का एलान किया गया। अपील पर पंजाब हाई कोर्ट ने सजा बरकरार रखी। गांधीजी के बेटों (रामदास और मणिलाल) ने दया याचिका दी, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल और गवर्नर-जनरल राजगोपालाचारी ने खारिज कर दी। 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में गोडसे और आप्टे को फांसी दी गई।