गाजियाबाद के हरीश राणा का केस, लाइफ स्पोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति, एम्स में चल रहा है इलाज
नई दिल्ली। देश के इतिहास में यह पहली बार होने जा रहा है जब देश की सर्वोच्च अदालत ने किसी को इच्छा मृत्यु की अनुमति दी है। हरीश राणा तेरह साल से कोमा में हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत ने हरीश राणा की लाइफ़ सपोर्ट यानि जीवनरक्षक मशीनें हटाने की मंज़ूरी दे दी है। झकझोर देने वाला यह फैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया है।
मौत में ना हो तख्लीफ
सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाते हुए एम्स को भी कुछ हिदायतें दी हैं, जिनमें कहा गया है कि एम्स दिल्ली को निर्देश दिया है कि वह सुनिश्चत करे कि जीवन रक्षक उपकरण और प्रणाली एक सुनियोजित योजना के तहत हटाई जाए ताकि व्यक्ति की गरिमा बनी रहे। उसे कोई कष्ट या पीड़ा न हो। कोर्ट ने कहा कि उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं, यह सिर्फ दुख को बढ़ाएगा।
केंद्र से कानून लाने का आग्रह
सर्वोच्च अदालत ने ऐसे मामलों को देखते हुए केंद्र सरकार से व्यापक परीक्षण के बाद कानून लाने का आग्रह किया है। क्योंकि कोर्ट के आदेश पर भारत में परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव इथुनीशिया) का यह पहला मामला है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 2018 में कामन काज के मामले में परोक्ष इच्छामृत्यु को मान्यता का फैसला दिया था, जिसमें कहा गया था कि कोमा जैसी स्थिति में पहुंचे रोगी की जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के संबंध में विशेषज्ञ राय के लिए एक प्राथमिक और एक सैकेंड्री चिकित्सा बोर्ड का गठन करना होगा और उसकी राय पर ही फैसले में तय दिशा निर्देशों के मुताबिक परोक्ष इच्छामृत्यु की इजाजत हो सकती है।
कौन हैं हरीश राणा
यह केस गाजियाबाद के हरीश राणा का है जो पंजाब विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग के छात्र थे और 2013 में अपने पेइंग गेस्ट आवास की चौथी मंजिल गिर गए थे। जिसके बाद उन्हें गंभीर चोटें आयीं थीं और तब से वह कोमा में हैं। उन्हें नली के जरिए दवाएं और भोजन पानी आदि दिया जाता है। कोर्ट ने कहा, उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं, यह सिर्फ दुख को बढ़ाएगा। कोर्ट ने कहा कि अब उसके चिकित्सा उपचार को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। कोर्ट ने चिकित्सा उपचार वापस लेने और हटाने के आदेश दिए हैं।