छावनी के बाजारों से जमा होता है 3147 करोड़ जीएसटी, विकास के नाम पर मिलती नहीं एक पाई भी, विकास के नाम पर निकायों को मिलता है तो कैंट को क्यों नहीं
नई दिल्ली/मेरठ। छावनी के बाजारों से जीएसटी के नाम पर केंद्र व राज्य सरकार को 3147 करोड़ का राजस्व मिलता है। नियम यह है कि तमाम टैक्स के रूप में जो रकम केंद्र व राज्य सरकार को मिलती है, उस रकम के अंशदान का एक हिस्सा विकास के लिए स्थानीय निकायों को दिया जाता है, कैंंट बोर्ड भी एक स्थानीय निकाय है, लेकिन जीएसटी के नाम पर सरकार को 3147 करोड़ का राजस्व देने के बाद भी विकास कार्यों के लिए कैंट बोर्ड को एक पाई नहीं मिलती। अब तक तो यही होता रहा है, लेकिन उम्मीद की जा रही है कि अब संभवत: ऐसा नहीं होने वाला है, क्योंकि राज्यसभा में सदन के मुख्य सचेतक व सदस्य डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने देश की आजादी के बाद से देश भर के कैंटोनमेंट के साथ हो रहे इस सरकारी अन्याय के खिलाफ पुरजोर तरीके से आवाज उठायी। इस प्रयास को तमाम सांसदों का समर्थन उन्हें मिला।
छावनी के विकास की हिस्सेदारी का है सवाल
सदन के माध्यम से डा. वाजपेयी ने सरकार को बताया कि राज्यों से जो केंद्रीय कर प्राप्त होते हैं उनको केंद्रीय वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार राज्याें को वापस कर दिया जाता है। जब राज्यों को यह रकम मिलती है तो राज्य विकास हेतु उस रकम को अपने नगर निकाय, नगर निगम, नगर पालिका परिषद, नगर पंचायत और जिला पंचायत को यह रकम आवंटित करती हैं, जबकि कैंटोंमेंट बोर्ड के जो वार्ड हैं उनसे भी टैक्स वसूला जाता है। छावनी क्षेत्र में जो बाजार हैं तथा वहां रहने वाले लोग हैं वो भी जीएसटी और आयकर देते हैं, तब फिर यह अधिकार कैंटोंमेंट बोर्ड क्षेत्र के नागरिकों को क्यों ना हो कि उनसे वसूले गए टैक्स का पैस जब केंद्र से राज्यों को आए तो राज्य से कैंटोमेंट बोर्ड को क्यों नहीं मिलना चाहिए।
छावनी क्षेत्र में बड़ी संख्या में नागरिक निवास करते हैं, ये राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था के बीच रहते हुए भी कई मूलभूत नागरिक सुविधाओं के अभाव का सामना कर रहे हैं। छावनी क्षेत्रों के संतुलित और समुचित विकास के लिए एक स्पष्ट और विशेष नीति की जरूरत है। डा. वाजपेयी ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा वित्त आयोग व अमृत योजना के अंतर्गत राज्यों को जो धनराशि प्रदान की जाती है, उसमें कैंटोनमेंट बोर्डों को भी उचित अंशदान सुनिश्चत किया जाए। वर्तमान में यह व्यवस्था नगर निगमों व स्थानीय निकायों को प्राप्त हाेती है, जबकि छावनी के लोग जीएसटी, आयकर, वैट, एक्साइज, आबकारी, बिजली ड्यूटी और भू-राजस्व जैसे तमाम कर देते हैं।
मेरठ का उदाहरण
राज्यसभा में इसको लेकर बोलते हुए डा. वाजपेयी ने मेरठ छावनी का उदाहरण देते हुए जानकारी देते हुए सरकार को बताया कि मेरठ कैंटोनमेंट से सरकार को 3147 करोड़ का राजस्व जीएसटी के नाम पर मिलता है, किंतु इस राजस्व का कोई प्रत्यक्ष हिस्सा कैंटोनमेंट बोर्ड को नहीं मिलता, जबकि स्वच्छता, सड़क, जलापूर्ति और अन्य नागरिक सुविधाओं की जिम्मेदारी बोर्ड पर है।
सरकार से आग्रह
डा. वाजेयी ने सरकार से आग्रह किया है कि वित्त आयोअ और अमृत योजना की राशि में कैंटोनमेंट बोर्डो को भी समुचित हिस्सा देने की नीति बनायी जाए, ताकि छावनी क्षेत्र का भी समुचित विकास हो सके। मेरठ कैंट बोर्ड प्रशासन समेत देश भर की तमाम 62 छावनियों के लिए यह एक अच्छी खबर है।डा. वाजेपयी के इस प्रस्ताव का देश भर के तमाम सांसदों ने समर्थन किया है।