टल भी सकती थी भगत सिंह की फांसी

kabir Sharma
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मुसलमान जज ने नहीं किए फांसी के फरमान पर साइन , पंड़ित श्रीकिशन ने की की ब्रिटिश की मदद, जस्टिस आगा हैदर अनसंग हीरो

नई दिल्ली। भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को 23 मार्च 1931 का लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी दी गयी। फांसी की खबर आते ही लाहौर समेत पूरा पंजाब अंग्रेजों के खिलाफ धधक उठा।जानकार बताते हैं कि भगत सिंह समेत राजगुरू और सुखदेव की फांसी टलना लगभग तय हो गया था क्योंकि मुसलमान जज आगा हैदर ने फांसी के आदेश पर साइन करने से इंकार कर दिया था। उन्होंने ब्रिटिश की नौकरी से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन एक ब्राह्मण पंड़ित श्रीकिशन अंग्रेजों का मददगार बन गया और फिर वो हुआ जिसने हर उस भारतीय का कलेज चीर दिया जो मुल्क की आजादी की जंग लड़ने वालों के साथ थे अंग्रेजों का साथ देने वालों के नहीं।

फांसी का काला अध्याय

मुल्क की ब्रिटिश से आजादी की जंग में शहीद भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु की फांसी एक ऐसा अध्याय है जो आज भी झकझोरता है। लेकिन इस घटना के पीछे एक मुस्लिम जज की बहादुरी और एक पंडित की ब्रिटिशों से सांठ-गांठ की कहानी है, जो इतिहास की किताबों में कम ही मिलेगी। जस्टिस सैयद आगा हैदर (Agha Haider) नाम के उस मुस्लिम जज ने भगत सिंह को फांसी से बचाने की भरपूर कोशिश की और अपना पद तक त्याग दिया, जबकि राय साहिब पंड़ित श्रीकिशन (Rai Sahib Pandit Sri Kishen) नाम के इस ब्राह्मण ने ब्रिटिश सरकार की मदद की, जिससे क्रांतिकारियों को मौत की सजा सुनाई गई। आइए इस पूरी घटना पर विस्तार से नजर डालें, जो सांप्रदायिक सद्भाव और देशभक्ति की मिसाल पेश करती है।

लाहौर केस-स्पेशल ट्रिब्यूनल

यह वाक्या 1928-1931 के बीच की है, जब भगत सिंह और उनके साथी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्य के रूप में ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ रहे थे। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका, जो ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ विरोध का प्रतीक था। इससे पहले, 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस जॉन सॉन्डर्स की हत्या हुई, जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव शामिल थे। ब्रिटिश सरकार ने इन क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए एक स्पेशल ट्रिब्यूनल गठित किया, जिसमें तीन जज थे, जिनमें जस्टिस जे. कोल्डस्ट्रीम (अध्यक्ष, ब्रिटिश), जस्टिस जी.सी. हिल्टन (ब्रिटिश) और जस्टिस सैय्यद आगा हैदर (भारतीय, मुस्लिम)। यह ट्रिब्यूनल 5 मई 1930 को शुरू हुआ। ब्रिटिशों का मकसद जल्दी से सजा सुनाना था, क्योंकि इन क्रांतिकारियों को लेकर पूरे भारत में अंग्रेजों के खिलाफ लगातार गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।

यूपी के सहारनपुर के था जस्टिस आगा हैदर

जस्टिस आगा हैदर, जो सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले थे और लाहौर हाईकोर्ट के जज थे, ट्रिब्यूनल के एकमात्र भारतीय सदस्य थे। वे बैरिस्टर थे और ब्रिटिश न्याय व्यवस्था में उच्च पद पर थे। लेकिन उनका दिल हिंदुस्तानी था। ट्रायल के दौरान, जब भगत सिंह और साथियों ने कोर्ट में ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाए और ‘सरफरोशी की तमन्ना’ गाना शुरू किया, तो ब्रिटिश जज कोल्डस्ट्रीम ने पुलिस को आदेश दिया कि उन्हें कोर्ट से बाहर निकालकर पीटा जाए। इससे क्रांतिकारियों को गंभीर चोटें आईं।

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आगा हैदर यह बर्दाश्त नहीं कर सके। उन्होंने लिखित में विरोध दर्ज किया: “मैं आरोपियों को कोर्ट से जेल ले जाने के आदेश का हिस्सा नहीं हूं और न ही इसके लिए जिम्मेदार हूं। आज जो कुछ हुआ, उससे मैं खुद को अलग करता हूं।” उन्होंने ब्रिटिश जजों से असहमति जताई और कहा कि यह न्याय नहीं, अत्याचार है।

7 अक्टूबर 1930 को जब ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई, तो आगा हैदर ने उस फैसले पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। ब्रिटिशों ने उन्हें रिश्वत की पेशकश की—शुगर मिल, हजारों एकड़ जमीन और संपत्ति—लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा: “मुझे निकाल दो, मैं जज हूं, कसाई नहीं (I am a judge, not a butcher)।” दबाव बढ़ने पर उन्होंने जज पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद ब्रिटिशों ने उन्हें ट्रिब्यूनल से हटा दिया और दो ब्रिटिश जजों के फैसले से सजा लागू की गई।आगा हैदर की यह बहादुरी आज भी सांप्रदायिक एकता की मिसाल है। वे 1947 में स्वतंत्र भारत में रहे, लेकिन इतिहास ने उन्हें ज्यादा जगह नहीं दी।

श्रीकिशन पंड़ित की करतूत

दूसरी तरफ, ब्रिटिशों की मदद करने वाले पंडित का नाम राय साहिब पंडित श्री किशन (Rai Sahib Pandit Sri Kishen) था। वे फर्स्ट-क्लास मजिस्ट्रेट थे और ट्रायल के शुरुआती चरण में शामिल थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के पक्ष में गवाही दी और सबूतों को मजबूत करने में मदद की, जिससे क्रांतिकारियों को दोषी ठहराया गया। उनके वफादार सेवाओं के लिए ब्रिटिशों ने उन्हें ‘राय साहिब’ का खिताब दिया। यह भी सुनना जाता है कि राय बहादुर सूरज नारायण (Rai Bahadur Suraj Narayan) का भी जिक्र है, जो प्रॉसिक्यूशन के वकील थे और RSS से जुड़े होने का दावा किया जाता है, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं है। मुख्य रूप से, पंडित श्री किशन ने ब्रिटिशों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक अन्य व्यक्ति हंस राज वोहरा थे, जो HSRA के सदस्य थे लेकिन अप्रूवर (सरकारी गवाह) बन गए और भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी, जिससे फांसी की सजा सुनिश्चित हुई। जस्टिस आगा हैदार की इस्तीफे के बाद ब्रिटिश जजों ने अंतिम फैसला दिया, लेकिन पंडित श्री किशन जैसे भारतीयों की ‘मदद’ से प्रक्रिया आसान हुई। गद्दार श्रीकिशन को ब्रिटिश हुकूमत ने दौलत से मालामाल कर दिया, आगा हैदर जैसे लोग गुमनामी में चले गए।

23 मार्च 1931 का वो मनहूस दिन

ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद, भगत सिंह की अपील प्रिवी काउंसिल में खारिज हुई। 23 मार्च 1931 को शाम 7:30 बजे लाहौर जेल में उन्हें फांसी दी गई—निर्धारित समय से 11 घंटे पहले, ताकि विरोध न हो। नावाब मुहम्मद अहमद खान कसूरी ने निगरानी की। शव परिवार को नहीं सौंपे गए, बल्कि सतलुज नदी के किनारे जला दिए गए। आजादी की लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम एकता कितनी मजबूत थी, लेकिन कुछ ‘देशद्रोही’ तत्वों ने ब्रिटिशों का साथ दिया।

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