सीईओ के दर से भी निराश लौटे, मिल तक नहीं जाकिर हुसैन, जाएं तो जाएं कहां तीन माह से सेलरी नहीं, ना आटा ना तोल ना इलाज के पैसे
मेरठ। कैंट बोर्ड में काम करने वाले श्रीराम कंपनी के कर्मचारियों को पिछले तीन माह से सेलरी नहीं मिली है। वो काम तो कर रहे हैं, लेकिन सेलरी के सवाल पर सुपरवाइजर झाड़ लगा देता है। सेलरी ना मिलने से परेशान ये कर्मचारी आज सीईओ कैंट से मिलने को पहुंचे थे ताकि उन्हें अपना दुख दर्द बता सकें, लेकिन सीईओ भी ना जाने ऐसी क्या बात थी कि मिले तक नहीं। तीन माह से बगैर सेलरी के काम कर रहे इन कर्मचारियों के लिए सीईओ का रवैया दिल तोड़ने सरीखा था, लेकिन लाचार थे मजबूर थे, इसलिए कुछ बोल नहीं सके। किसी से कुछ कह नहीं सके, बेउम्मीद लौट आए। ये सभी कर्मचारी सब एरिया मुख्यालय में डयूटी करते हैं। हालांकि बाद में सेनेट्री सेक्शन के इंस्पेक्टर अभिषेक गंगवार ने इन कर्मचारियों के साथी राहुल राजेश दिनेश जयदीप रोहित से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि सर्किल 12 जिसके सुपरवाइजर अनिल हैं वहां करीब चार सौ कर्मचारी काम करते हैं। इन सभी को तीन माह से सेलरी नहीं मिली है।
जाए तो जाएं कहां
सेलरी ना मिलने से परेशान कैंटोनमेंट के बाहर खड़े इन कर्मचारियों ने नाम ना छापे जाने की शर्त पर बताया कि कैंट बोर्ड की मेनपावर कंपनी श्रीराम एजेंसी के सुपरवाइजर अनिल से जब भी सेलरी को कहते हैं तो वह झिड़क देता है। सेलरी की बात नहीं करता है बाकि सब बातें करता है। सेलरी के नाम पर वह रोज अगले दिन की बात करता है। लेकिन वो दिन कभी नहीं आता जिसे सेलरी का दिन कहा जाए। इन कर्मचारियों का कहना है कि सेलरी के नाम पर कंपनी और उसके सुपरवाइजर के रवैये के चलते उन्हें उम्मीद थी कि सीईओ उनका दुखड़ा सुनेंगे, लेकिन सीईओ का रवैये के बाद अब वो जाए तो जाएं कहां।
कैसे करें परिवार का गुजारा
कर्मचारियों ने बताया कि वो सभी घर परिवार वाले हैं। घर परिवार से इतनी दूर इसीलिए आएं हैं, ताकि यहां पर काम करके घर परिवार को पालने लायक कमा सकें। इन्होंने बताया कि उनका घर है, बच्चे हैं। परिवार में कुछ लोग बीमार भी हैं। इन सब के इतर बच्चों की पढ़ाई का खर्चा आटा दाल और दूध का खर्चा। जरा सोचिए कि जिस शख्स को तीन माह से सेलरी तक नहीं मिली है वो कैसे गुजरा करेगा। कहां से बच्चों की फीस भरेगा। आटा दाल कहां से आएंगा। परिवार के एक बीमार सदस्य की दवा कहां से आएगी। कर्मचारियों का कहना है कि वो उस वक्त को कोस रहे हैं जब यहां पर नौकरी करने आए थे। जो सपना संजो कर यहां नौकरी के लिए आए थे वाे सपना अब टूटता नजर आ रहा है। तीन माह हो गए है सेलरी का इंतजार देखते हुए समझ नहीं आ रह है कहां जाएं क्या करें।
::::::::::::::::काम करते हैं सेलरी का पता नहीं::::::::::::::::::::::::::::::::::