कभी 51 सौ से ज्यादा तालाब थे अब मुश्किल से एक हजार बचे हैं उनमें से भी 323 पर अवैध कब्जा
मेरठ। जनपद में कभी 5121 सौ से ज्यादा तालाब हुआ करते थे, लेकिन इस वक्त बामुश्किल एक हजार ही बचे हैं। हजार में भी 323 तालाबों का पानी माफिया पी गए। जहां कभी तालाब हुआ करते थे वहां मार्केट और दूसरी बिल्डिंग खड़ी व कालोनियां खड़ी हैं। अधिकारी मान रहे हैं कि अवैध कब्जे हैं, लेकिन अवैध कब्जे के खिलाफ जब कार्रवाई को लेकर सवाल किया जाता है तो आॅफ दा रिकार्ड पर आ जाते हैं। सांसद अरुण गोविल ने जिले के तालाबों को लेकर अपनी चिंता का इजहार किया है। उन्होंने इसके लिए एक पत्र जिला भूमि संरक्षण अधिकारी को भी लिखा है। सांसद ने अपने पत्र में किनानगर-1, अटौला, धीरखेड़ा, हसनपुर कदिम, फखरपुर, कबट्टा, छिलौरा, जिटौली, औरंगाबाद, बहचौला, भूड़पूर, बिजौली, नरहाड़ा, उलधन, खरदोनी, समयपुर, किना नगर-2, लढ़पुरा, खासपुर, ज्ञानपुर, सिखेड़ा, शाहकुलीपुर, कुढ़ला, बधौली, रसूलपुर औरंगाबाद, खासपुर, मुण्डाली, नित्यानंदपुर, छिलौरा, पंचगांव पट्टी सांवल, गैसूपुर शुमाली और नंगला कबूलपुर आदि गांवों में स्थित तालाबों का जिक्र किया है। लेकिन जिन्होंने भी सांसद तक जिले के तालाबों की बदहाली की दशा पहुंचाने का काम किया है उन्होंने शायद यह नहीं बताया कि मेरठ जनपद में कभी 51 सौ से ज्यादा तालाब हुआ करते थे, जिनमें से अब मजह एक हजार रह गए हैं और इन एक हजार में से 323 तालाबों पर अवैध कब्जे हैं।
यह है तहसीलवार स्थिति
-सदर तहसील-126
-मवाना तहसील-112
-सरधना तहसील-85
योजना हैं काम नहीं
तालाबों को बचाने के लिए ऐसा नहीं है कि सरकार की ओर से कोई योजना नहीं बनायी गयी है। अमृत सरोबर योजना व अटल भू-जल योजना के अलावा भी कई अन्य योजनाएं तमाम सरकारों में तालाबों को बचाने के लिए समय-समय पर जारी की गईं, लेकिन अधिकारियों ने इन योजनाओं पर काम कितना किया इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 5121 सौ में से अब महज एक हजार तालाब ही बचे हैं और इन एक हजार में से भी 323 पर अवैध कब्जे हैं।
तालाब पर नजर पंचायत का दफ्तर व मार्केट
तालाबों को लेकर अफसर कितने संवेदनशील हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नगर पंचायत करनावल का दफ्तर और मार्केट गांव के तालाब के ऊपर बना हुआ है। हालांकि बात यह करीब दो दशक से ज्यादा पुरानी है वो यह इस बात का खुलासा तालाबों पर काम करने वाले हिन्दू संगठन के नेता विनोद कुमार ने किया। बकौल विनोद कुमार साल दो हजार में तत्कालीन चेयरमैन ने यह सारी कारगुजारी अंजाम दी। इसको लेकर काफी लिखा पढ़ी भी की गईं। काफी आगे तक फाइल भी चली लेकिन बाद में तब की सरकार के अफसरों ने फजीहत की बात कहकर फाइल को वहीं दफन कर दिया। विनोद कुमार बताते हैं कि करनावल में ही एक अन्य तालाब पर करीब छह माह पूर्व कब्जे का प्रयास किया गया। दरअसल नगर पंचायत के मार्ग की कई सड़कें बनी थीं। उस कार्य के दौरान जितना भी मलवा निकला वो सभी उस तालाब में डालवाया जाता रहा। गांव के लोगों ने उसका विरोध किया। मामला जब डीएम तक पहुंंचा तब कहीं जाकर कब्जे का काम रोका गया। जो लोग कब्जा कर रहे थे वो तालाब की भूमि पर प्राइवेट स्टेडियम बनाना चाहते थे, जबकि करनावल में पहले से सरकारी स्टेडियम है। तालाबों पर कब्जे कैसे किए जाते हैं यह उसकी वानगी भर है।
यह कहना है इनका
जिला पंचायत एएमए परविंद कुशवाह का कहना है कि वह कुछ समय पहले आए हैं तालाबों के कब्जे के संबंध में वह कुछ नहीं कह सकते पंचायतें जो काम तय करती हैं वो करा दिए जाते हैं।
जिला मत्स्य पालन अधिकरी विनोद कुमार का कहना है कि तालाबों पर कब्जों को लेकर उन्हें कुछ नहीं कहना ना ही यह काम उनके विभाग के आधीन आता है। कोई शिकायत भी नहीं आयी है।
जिला भूमि संरक्षण अधिकारी का चार्ज जिला कृषि अधिकारी राजीव सिंह के पास हैं, लेकिन उनका नंबर स्विच ऑफ जाता रहा।
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता सरबजीत सिंह कपूर बताते हैं कि जिले में तालाबों की दशा बहुत खराब है, यदि तालाब नहीं बचे तो साल 2040 में पानी के लिए ग्रहयुद्ध होगा। सदर, मवाना व सरधना तीनों तहसीलों में तालाबों पर कब्जे हैं
तालाबों के लिए काम करने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट विनोद कुमार का कहना है कि चार हजार से ज्यादा तालाबों पर मेरठ में कब्जा हो चुका है। इन कब्जों में अफसर और माफिया शामिल हैं।