मेरठ को दरकार एक भागीरथ की

kabir Sharma
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हाईकोर्ट बैंच एम्स सेंट्रल यूनिवर्सिटी हस्तिनापुर तक रेलवे लाइन और मेरठ से उड़ान, चुनाव में ये तमाम वादे किए जाते हैं, इन वादों में भाजपा अव्वल

मेरठ। पौराणिक और क्रांति का इतिहास संयोए एतिहासिक मेरठ को एक ऐसे भागीरथ की दरकार है जो मेरठ वालों की आजादी के बाद जितनी भी मुरादें रही हैं वो पूरी कर दे, जो अब नेता नजर आ रहे हैं इन्हें खुद ही तय करना है कि किसमें इतनी कूबत है जो मेरठ का भागीरथ कहलाए। उसके जाने के बाद भी वो याद रहे जैसे की भागीरथ को याद रखा जाता है। ऐसा कौन होगा जो भागीरथ कहलाएगा। मेरठ के लोगों की लंबे समय से चली आ रही प्रमुख मांगें—हाईकोर्ट बेंच, एम्स (AIIMS), सेंट्रल यूनिवर्सिटी, हस्तिनापुर तक रेल कनेक्शन, और हवाई अड्डा—चुनावों के समय नेताओं की जुबान पर जरूर चढ़ती हैं, लेकिन चुनाव बाद ये मांगें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। जनता हर बार वादों पर भरोसा करती है, लेकिन हकीकत में प्रगति धीमी या न के बराबर रहती है। इनके लिए नेता नहीं किसी भागीरथ की जरूरत है क्योंकि जनता समझ चुकी है कि ये नेताओं के बूते से बाहर की बात है।

हाईकोर्ट बैंच

हाईकोर्ट बैंच की मांग पांच दशक पुरानी है। मेरठ की यदि बात करें तो यहां से पाकिस्तान का लाहौर शहर पास पड़ता है और इलाहाबाद हाईकोर्ट दूर। पश्चिमी यूपी (22 जिलों) के लिए प्रयागराज से 700 किमी दूर हाईकोर्ट जाना आम जनता के लिए महंगा और मुश्किल है। मांग जोरों पर है, लेकिन कोई समयसीमा या स्वीकृति नहीं। चुनावों में फिर याद आएगी।

मेरठ में एम्स (AIIMS)

गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर मेरठ के हिस्से में ले देकर केवल एलएलआरएम मेडिकल है। चुनाव में भाजपा ने मेरठ से एम्स का वादा किया था। केंद्र सरकार ने PMSSY के तहत कई नए AIIMS स्वीकृत किए हैं, लेकिन मेरठ में कोई नया AIIMS नहीं है। कुछ पुराने मेडिकल कॉलेजों को AIIMS जैसा अपग्रेड करने की बात हुई है, लेकिन मेरठ स्पष्ट रूप से शामिल नहीं।

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मेरठ में सेंट्रल यूनिवर्सिटी

मेरठ में सेंट्रल यूनिवर्सिटी का चुनावी शिगूफा भी भाजपा का उछाला हुआ है। यूं कहने को मेरठ में चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी है। लेकिन चुनाव में सेंट्रल यूनिवर्सिटी का वादा करने वाले अपना वादा भूले बैठे हैं। मामला केवल चुनावी भाषणों तक सीमित रह गया। प्राइवेट यूनिवर्सिटीज बढ़ रही हैं, उनमें पढ़ाना गरीब और मीडिकल क्लास से बूते के बाहर की बात है। मेरठ में सेंट्रल यूनिवर्सिटी का भी वही हश्र होकर रह गया हो हाईकोर्ट बैंच, एम्स का किया।

हस्तिनापुर तक रेल कनेक्शन

कौरव पांडवों की नगरी हस्तिनापुर में रेलवे कनेक्शन की मांग हाईकोर्ट बैंच की मानिंद पचास दशक पुरानी है। लोग चाहते हैं कि हस्तिनापुर (जैन तीर्थ स्थल) और बिजनौर को मेरठ से जोड़ा जाए। बीच में कुछ सुनने को भी आया था, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ हुआ हो ऐसी जानकारी नहीं।

मेरठ से हवाई उड़ान

मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में परतापुर हवाई पट्टी का जो स्टेटस था मसलन केवल वीआईपी प्लेन की लेंडिग उससे आगे बात नहीं बढ़ सकी। ऐसा नहीं कि नेताओं को चिंता ना हो। लेकिन उनकी चिंता केवल बयानों में नजर आती है। मेरठ के आसापास से तमाम स्थानों से हवाई उड़ान शुरू हो गयी। जेवर में तो इंटरनेशनल एयरपोर्ट तक बना दिया गया, लेकिन मेरठ के नेताओं में शायद जेवर के नेताओं सरीखी कूवत नहीं। इसलिए कहा जा रहा है कि नेता नहीं भागीरथ चाहिए।

नेताओं की नहीं इच्छा शक्ति की कमी

मेरठ में नेता बहुत हैं, लेकिन दरकार तो भागीरथ की है। नेताओं की यदि बात करें तो राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से अटकी हुई हैं। चुनाव आते ही वादे बरसते हैं—टिकट, रैली, घोषणापत्र में जगह मिलती है—लेकिन सत्ता में आने के बाद प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। जनता को बार-बार धोखा मिलता है, और नेता अगले चुनाव का इंतजार करते हैं।क्या ये मांगें कभी पूरी होंगी? अगर जन दबाव और संगठित आंदोलन जारी रहा, तो शायद जल्दी। वरना, ये “चुनावी एजेंडा” बनकर रह जाएंगी। मेरठवासियों को चाहिए कि वोट की ताकत से जवाबदेही सुनिश्चित करें, ताकि वादे हकीकत बनें, न कि सिर्फ भाषण

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