शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद मामले से झाड़ा पल्ला, अकेले पड़े शंकराचार्य, योगी सरकार नहीं मानती उन्हें शंकराचार्य, सनातन के ठेकेदारों को सूंघा सांप
नई दिल्ली/प्रयागराज। खुद को सनातन का ठेकेदार व हिन्दू धर्म का रक्षक कहने वाले कथावचन व कुछ नई उम्र के लौंडों को शंकरचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मामले में सांप सूंध गया। उनके कथित अपमान के मामले में कोई बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। अविमुक्तेश्वरानंद अकेले पड़ गए हैं। योगी सरकार ने तो उन्हें शंकराचार्य तक मानने से इंकार कर दिया है। यह घटना योगी सरकार की “संत-विरोधी” छवि बनाने का हथियार बनी है। शंकराचार्य की मुखरता (सरकार विरोधी बयान) को इस पूरी घटना की वजह बताया जा रहा है। हिंदू संगठन और कथा वाचक (जो अक्सर BJP-समर्थक होते हैं) चुप हैं, क्योंकि शंकराचार्य अक्सर BJP की नीतियों की आलोचना करते हैं।
सनातन की रक्षा का ढोल पीटने वाले छुपे हैं कहां
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अक्सर मोदी सरकार की आलोचना करते हैं (गौ-हत्या, राम मंदिर अधूरा, वक्फ बिल आदि पर)। वह राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बहिष्कृत कर चुके हैं, लेकिन कथा वाचक (जैसे बागेश्वर धाम के धीरेंद्र शास्त्री) और कई हिंदू संगठन (VHP, RSS से जुड़े) इस घटना पर चुप हैं। इसके अलावा कई रिपोर्ट्स में इसे “मोदी-विरोधी संत” के अपमान से जोड़ा जा रहा है। जहां सनातन रक्षा के नाम पर छोटी-छोटी बातों पर हल्ला मचता है, वहां एक प्रमुख शंकराचार्य के साथ हुई मारपीट और अपमान पर संगठनों की खामोशी सवाल खड़े कर रही है। विपक्ष दलों में कांग्रेस, सपा, AAP ने योगी सरकार पर हमला बोला है। अखिलेश यादव ने कहा “साधु-संतों का अपमान अक्षम्य”, कांग्रेस ने “जब मोदी नतमस्तक होते थे तब शंकराचार्य थे, अब सवाल उठा रहे हैं”। AAP नेता सौरभ भारद्वाज ने कहा “शंकराचार्य जीवित आध्यात्मिक गुरु हैं, उनका अपमान हिंदुओं के लिए शर्मिंदगी”।