ईरान से वार्ता में पाक का मध्यस्थता का दावा, ईरान से पाकिस्तान के पुराने करीबी संबंध, भारत को साइड लाइन किए जाने पर यूएस पर सवाल
नई दिल्ली/इस्लामाबाद/तेहरान। पचास दिन से चले आ रही जंग को खत्म करने के लिए बातचीत के लिए यूएस का पाकिस्तान को तरजीह देना और भारत को साइड लाइन कर देना, इस पर सवाल उठ रहे हैं। पाकिस्तान इस बात को बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रहा है। हालांकि अधिकृत रूप से यूएस ने इस्लामाबाद का नाम नहीं लिया, लेकिन पाक को लेकर यूएस का साफ्ट कार्नर किसी से छिपा नहीं है। वास्तव में अमेरिका ने भारत को “नहीं चुना” ऐसा सीधा बयान कहीं नहीं है। पाकिस्तान की सक्रिय कोशिश (असिम मुनीर-ट्रंप कॉल) और उसके ईरान से संबंधों के कारण यह हुआ। भारत अमेरिका का बड़ा साझेदार है (QUAD, व्यापार, डिफेंस), लेकिन इस खास संघर्ष में पाकिस्तान की भौगोलिक/धार्मिक पहुंच काम आ रही है। हालांकि यह भी सच है कि ईरान बार-बार कह रहा है कि यूएस से कोई बातचीत नहीं की जा रही है।
पाकिस्तान ने खुद को पेश किया
मिडिल ईस्ट में चल रही लड़ाई को लेकर पाकिस्तान ने खुद को एक तरह से दुनिया के सामने पेश किया या यूं भी कहा जा सकता है कि उसने मौके का फायदा उठाया। पाकिस्तान ने खुद को “न्यूट्रल वेन्यू” बताया है क्योंकि उसके ईरान से अच्छे संबंध हैं। तुर्की, मिस्र और पाकिस्तान अमेरिका-ईरान के बीच मैसेज पास कर रहे हैं। इस्लामाबाद में जल्दी ही यूएस और ईरानी अधिकारी के बीच बातचीत की उम्मीद की जा रही है।
भारत क्यों नहीं
ईरान से बातचीत के मामले में भारत क्यों नहीं, क्या भारत की यह कूटनीतिक शिकस्त है। कई भारतीय मीडिया और कांग्रेस (सुप्रिया श्रीनाते आदि) ने इसे “भारत की अनुपस्थिति” और मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल बताया है। कुछ इसे स्ट्रैटेजिक सेटबैक मान रहे हैं क्योंकि पाकिस्तान को लेवरेज मिल रहा है। फिर ट्रंप को तो पीएम मोदी करीबी दोस्त बताते हैं। करीबी दोस्त ने फिर भारत को तरजीह क्यों नहीं दी। व्हाइट हाउस ने इन रिपोर्ट्स पर स्पष्ट रूप से पुष्टि नहीं की, बल्कि कहा कि स्थिति “बहुत संवेदनशील” है और कोई कमेंट नहीं कर सकते। लेकिन भारत के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। यह तूल भी पकड़ेगा यह भी सच है।