निगम उपाध्यक्ष के चुनाव में विपक्ष कहां था

kabir Sharma
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कार्यकारिणी में विपक्ष के चार पार्षद सदस्य, चारों ही नहीं आए नजर, पुलिस का या फिर पैसों का था दबाव

मेरठ। नगर निगम कार्यकारिणी के उपाध्यक्ष के चुनाव में कार्यकारिणी के चुनाव में विपक्ष के गायब रहने को तमाम सवाल उठाए जा रहे हैं। पूछा जा रहा है कि पैसों का दवाब था या फिर पुलिस का। नगर निगम कार्यकारिणी में विपक्ष के चार सदस्य हैं। इनमें कहकशां, कीर्ति घाेपला, इकराम सैफी ओर संजय सैनी। संजय सैनी को यदि अपवाद मान लिय जाए तो कार्यकािरणी में बाकि के तीन सदस्य जो सपा से हैं वो नजर ही नहीं आए। और तो और विपक्ष के नाम पर उपाध्यक्ष चुनाव के लिए किसी ने नामांकन पत्र ही नहीं खरीदा था। जबकि होना चाह चाहिए था कि जब चुनाव की तारीख तय कर दी गयी थी तो चुनाव परिणाम भले ही कुछ भी क्यों ना होता, कम से कम विपक्ष मौजूदगी तो दर्ज कराता। निगम में मुख्य विपक्षी दल का चुनाव से ही गायब हो जाना तमाम सवालों को जन्म दे रहा है और कार्यकारिणी सदस्यों की स्थिति को लेकर सवाल पूछ रहा है कि इन सदस्यों पर प्रेशर पैसों का था या फिर पुलिस प्रशासन को जो हार जीत के लिए चुनाव लड़ना तो दूर की बात रही, चुनाव में मौजूदगी तक दर्ज नहीं करा सके।

तय कर लिया था चुनाव जीतना है

नगर निगम कार्यकारिणी सदस्यों के चुनाव में फजीहत के बाद भाजपा के रणनीतिकारों ने ठान लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन कार्यकारिणी उपाध्यक्ष का चुनाव जीतकर रहेंगे। हालांकि जानकारों की मानें तो उपाध्यक्ष जैसे चुनाव को लेकर महानगर भाजपा में तीन खेमे बन गए। यह बात अलग है कि बाजी दक्षिण विधानसभा मार ले गयी। अब बात भाजपा की चुनावी रणनीति की। महानगर भाजपा के चुनावी रणनीतिकारों को इस बात की पूरी जानकारी थी कि विपक्ष की ओर से संजय सैनी चुनाव लड़ने में उतरने जा रहे हैं। वो यह भी जानते थे कि कार्यकारिणी में भाजपा के सदस्यों में यदि किसी एक के नाम का एलान पहले कर दिया गया तो सौ फीसदी कार्यकारिणी में तीन सदस्य पार्षद पाला बदल लेंगे। इनके करीबी कनेक्शन संजय सैनी से गिनाए जा रहे हैं। भाजपा ने अंत तक यानि मतदान केंद्र सीसीएसयू के अटल सभागार के बाहर नामांकन पत्र खरीदने तक भी यह साफ नहीं किया कि पार्टी किस को उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ाना चाह रही है।

छह के छह को रखा भरोसे में

नगर निगम कार्यकारिणी में भाजपा के आठ सदस्य पार्षदों में से छह ऐसे थे जो चुनाव के लिए ताल ठोक रहे थे। महानगर संगठन ने इन सभी छह को लास्ट मूवमेंट तक भरोसे में रखा और हर एक से यही कहते रहे कि बाकि को छोड़िये आपको ही चुनाव लड़ाया जाएगा। इसका फायदा यह हुआ कि विपक्ष के हाथों खरीद फरोख्त की जो आशंका थी वो निर्मूल साबित हुई। भाजपा के छह के छह कार्यकारिणी सदस्य इसी झांसे में रहे कि चुनाव तो उन्हीं को लड़ाया जाएगा और इस तरह से उनका उपाध्यक्ष बनना तय है। जहां तक वोट का सवाल है तो कार्यकारिणी में भाजपा के आठ सदस्य पार्षद और 9वीं वोट महापौर की। जबकि विपक्ष के नाम पर कहकशां, कीर्ति घोपाला, इकराम सैफी और भाजपा के बागी संजय सैनी। लेकिन जब अनिल वर्मा के नाम का एलान किया गया तब महानगर संगठन की रणनीति भाजपाई दावेदारों को समझ में आयी, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। उस समय अनिल वर्मा का नामांकन भरवाने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया था।

विपक्षी खेमा गायब

अनिल वर्मा के लिए नामांकन पत्र खरीदा गया और उसको भरकर दाखिल किया गया। विपक्ष के नाम पर किसी ने नामांकन पत्र ही नहीं खरीदा। नतीजा यह हुआ कि अनिल वर्मा को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिय गया। इस बीच सूत्रों की मानें तो नगर निगम कार्याकारिणी उपाध्यक्ष के चुनाव से विपक्ष यानि सपा के पूरी तरह से गायब होने का मामला पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव तक पहुंचा दिय गया है।

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