
मेरठ। पीएल शर्मा रोड स्थित किंग बेकरी मार्केट के अवैध निर्माण को वैध साबित करने के लिए मेरठ विकास प्राधिकरण के अफसरों के खेल पर वर्तमान उपाध्यक्ष बजाए बैरियर डालने के इस खेल का हिस्सा हो गए लगते हैं। दरअसल यह सारे खेल की बीज पूर्व नगर नियोजक विजय सिंह ने रोपा था। विजय सिंह ने केवल किंग के अवैध निर्माण को किंग बनाने का बनाने का ही काम नहीं किया बल्कि महानगर में जितने भी अवैध निर्माण हैं, उनके सूत्राधार भी विजय सिंह ही थे, ऐसा नहीं कि वर्तमान वीसी विजय सिंह के खेल से अंजान हो। जानकारों की मानें की विजय सिंह को यहां रिलीव करने के बाद उनकी सभी फाइलें जो उन्होंने अपने ट्रांसफर के बाद कई दिन लगाकर साइन की थी उन पर रोक लगा दी, लेकिन बाद में फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक किंग को किंग बनाने के लिए अवैध कांप्लैक्स की फाइल में शमन के कागज जोड़ दिए गए। जो अवैध कांप्लैक्स लगातार साल 2014 से एमडीए के फाइलों में सील चला आ रहा था, उसकी फाइल में एकाएक शमन का पेपर किस की कारगुजारी है, इसके पीछे किसक खेल है। इस पूरे मामले प्राधिकरण के नीचे से लेकर ऊपर तक के अफसरों खेल में शामिल लगता हैं, क्योंकि बगैर एक भी अफसर के साइन के शमन संभव नहीं। हैरानी केवल प्राधिकरण की अफसरों की इस कारगुजारी तक सीमित नहीं, इससे बड़ी हैरानी तो फायर एनओसी देने वाले अग्निशमन अफसरों पर है। साल 2022 तक जो फायर अफसर इस अवैध इमारत को फायर अफसर एनओसी से इंकार करते रहे, फिर एकएक ऐसा क्या हुआ कि फायर की एनओसी जारी हो गई। या फिर यह मान लिया जाए, किस जिस खेल को प्राधिकरण के नीचे से ऊपर तक के तमाम अफसरों ने अंजाम दिया उसी खेल का हिस्सा फायर अफसर भी बन गए। इसको कहते हैं कि हमाम में सभी नंगे हो गए। हालांकि इस मामले को अंजाम तक पहुंचाने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट मनोज बताते हैं कि अब प्राधिकरण अफसर सफाई दे रहे हैं कि सशर्त शमन किया जा रहा है। भाई प्राधिकरण के कोई भी अफसर सशर्त शमन की परिभाषा भी बता दें, कि जिस भवन पर लगातर सील लगी आ रही हो, जिसके ध्वस्तीकरण आदेश तक किए गए हो, पहला सवाल तो यही कि सील के बावजूद वो कैसे बन गया। इसके अलावा दूसरा यह कि जिसके ध्वस्तीकरण के आदेश हो उसका शमन किस आधार पर किस आधार पर किया जा रहा है। या तो इस अवैध इमारत पर सील और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करने वाले प्राधिकरण के अफसर गलती कर गए थी, या फिर शमन की कार्रवाई गलत की जा रही है, लेकिन गलत को गलत कहने की हिम्मत तो तभी कर सकते हैं, जब हमाम में ऊपर से लेकर नीचे तक के अफसर अपने इमान की शर्त पर नंगे हो जाए तो फिर कुछ भी कहना मुनासिव नहीं, लेकिन आरटीआई एक्टिविस्ट का कहना है कि प्राधिकरण के अफसर भले ही ईमान से सौदा कर ले, लेकिन उनके ईमान को खरीदने की कूबत किसी में नहीं। मनोज का कहना है कि इस सारी कारगुजारी को वह शासन तक पहुंचाएंगे और यदि वहां से भी कोई बड़ी कार्रवाई मतलब अवैध कांप्लैक्स को गिराने के आदेश देने में इफ बट होता है तो उन्हें इस देश के कानून पर पूरा भरोसा है। इस मामले को लेकर वह हाईकोर्ट जाएंगे, लेकिन किसी दशा में इसको गिरवा कर ही दम लेंगे। मनोज कुमार यह भी बताते हैं कि इसके लड़ी गई लंबी लड़ाई को वह जाया नहीं होने देंगे भले ही उन्हें कुछ भी कीमत क्यों ना उन्हें चुकानी पड़े। मनोज इस इमारत के साइड इफैक्ट भी गिनाते हैं। उन्होंने बताया कि पहला साइड इफक्ट तो यही कि अवैध इमारत की वजह से पीएल शर्मा रोड जैसे बेहद तंग मार्केट में इस अवैध इमारत की वजह से जबरदस्त जाम की समस्या होने वाली है। गली में जो दुकानें बना दी गयी हैं, उनकी वजह से वहां रहने वाले परिवारों की गाड़ियां तक नहीं निकल पाएंगे। शमन करने वाले प्राधिकरण के अधिकारियों को शायद इन चीजों की परवाह नहीं हैं। उन्होंने बताया कि प्राधिकरण के जो अफसर शमन की बात कर रहे हैं, वो सभी हाईकोर्ट की कार्रवाई के दायरे में होंगे। इसलिए बेहतर तो यही है कि प्राधिकरण के अफसर शमन के नाम पर जो भ्रष्टाचार का खेल शुरू किया गया है, उससे अपने हाथ झाड़कर इसके ध्वस्ती करण की कार्रवाई तो बेहतर होगा।
आप तो ऐसे ना थे-बहुत विश्वास था आप पर
कई वीसी आए और चले गए, किसी ने भी अवैध इमारत किंग कांप्लेस की फाइल को हाथ तक नहीं लगाया और आपने साइन करने में पल भर की देरी नहीं लगायी, जबकि सुनने में आया था कि विजय सिंह जाते-जाते जो फाइलें निपटा गया था, उन पर आपने रोक लगा दी थी, फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि आपने साइन कर दिया या फिर यह माना जाए कि जिस में सब नंगे हैं आप भी उस हमाम में उतर गए। आप तो ऐसे नहीं थे। वहीं दूसरी ओर आरटीआई एक्टिविस्ट मनोज ने बताया कि उन्हाेंने वीसी को तमाम खतरों से अवगत करा दिया है कि मामला कहां तक जाएगा। वीसी नहीं नहीं जो भी इस मामले से जुड़े हैं वो सभी हाथ बांधे नजर आएंगे।