मेरठ। बेलगाम मौत की मानिंद दौड़ती गाड़ियों के खिलाफ बजाए लगातार नियमित रूप से कार्रवाई और निगरानी के बजाए इसके लिए जिम्मेदार सिस्टम को लगता है एक और हादसे का इंतजार है। दो मासूम बच्चियों की जान ऐसी ही बेलगाम भागती बसों ने ले ली। उम्मीद की जा रही थी कि अब शायद यह सिलसिला थम जाएगा, लेकिन बेगमपुल से मेडिकल की ओर जा रही एक ऐसी ही इलैक्ट्रानिक बस पूरी रफ्तार से दौड़ती देखी तो कलेजा बैठ गया। शहर के लोगों का कहना है कि दो मासूमों की जान लेने के बाद लोग मान रहे थी कि इस सिस्टम को संभालने वाले सख्ती करेंगे, लेकिन सख्ती को दूर की बात जिस रफ्तार से बस को बेगमपुल से आगे रफ्तार में दौड़ते देखा तो इससे इतना तो साफ है कि किसी की मासूम बच्चियों की मौत से इन पर कोई असर नहीं हुआ है। होता भी कैसे बसों का संचालन कराने वाले अफसरों के बेटियां कोई मरी हैं, जिनकी मरी हैं उनके सीने में जिंदगी भर के लिए जख्म बन गया है, उस जख्म को कोई भी नहीं भर पाएगा, मौत के बाद वो जख्म उनके साथ ही जाएगा। जब ऊपर वाला जख्म के बाद पूछेगा तो वो कहेंगे कि आखिर हमारे मासूम बेटी का क्या कसूर था, जो उसकी जान ऐसे ले ली। तब शायद भगवान के पास भी इस सवाल को काई जवाब नहीं होगा। भगवान के पास मासूम की मौत का जवाब हो या ना हो, लेकिन ट्रैफिक पुलिस तो जवाब दे कि दो बच्चियों की मौत के बाद कितने बसें सीज की हैं। कितना अभियान चलाया गया। हादसों के बाद एक दिन चैकिंग व चलान की नौटंकी के बाद लगता है कि वो भी थक गए, क्योंकि जिसका जाता है वहीं इस दर्द को समझ सकता है, दूसरा और कोई नहीं।