
निजाम बदला तो बदल गए कायदे कानून भी, अब सब हुआ मुमकिन पहले निर्माण कराते हैं, फिर सील उसके बाद कंपाउंड कर अवैध निर्माण को पहना दिय जाता है कानूनी जामा
मेरठ। मेरठ विकास प्राधिकरण में निजाम बदला तो जोनल सरीखे अधिकारियों ने ऐसा चक्कर चलाया कि अवैध निर्माणों खासतौर से जिन पर सील गायी गयी है उसके तमाम कायदे कानून ही बदल दिए गए। अवैध निर्माण के साथ ही पार्किग का इंतजाम हो या ना हो और सरकारी जमीन पर कब्जा भी किया हो यदि जेब भारी है तो कोई टेंशन नहीं, वहीं दूसरी ओर प्राधिकरण के अफसर पहले अवैध निर्माण की इजाजत देते हैं उसके बाद सेटिंग से जो अवैध निर्माण करते हैं उसको फिर सील की नौटंकी की जाती है। सील इसलिए लगाई जाती है कि यदि कहीं गर्दन फंसे तो कह सकें कि सील लगा दी थी, यदि ऊपर यानि शासन से कोई जवाब तलब नहीं होता है तो फिर जिन भवनों पर सील लगाई जाती है फिर सील लगे-लगे उसका निर्माण पूरा कराया जाता है, निर्माण निर्माण पूरा हो जाता है तो उल्टे दरवाजे से उस बिल्डिंग के अवैध निर्माण को कंपाउंड के नाम पर कानूनी जाम पहना दिया जाता है। लेकिन उसके लिए जेब का भारी होना जरूरी है, जेब भारी है तो वो काम भी आसान है जो कायदे कानून का यदि पालन किया जाए तो किसी भी दशा में नहीं हो सकता। भले ही वहां पार्किग हो या ना हो और आने जाने वालों की गाड़ियां रोड पर ही क्यों ना पार्क होती हो। अवैध निर्माण करने वालों ने भले ही आने जाने के लिए सड़क कब्जा ली हो, इसके बावजूद केस कंपाउंड करा दिया जाएगा। शहर में ऐसे ही तीन बड़े अवैध निर्माण हैं जिन पर प्राधिकरण ने सील लगायी और सील के बाद वो अवैध निर्माण पूरे कराए गए और बाद में कंपांडिंग की मोहर लगाकर उन्हें कानूनी रूप दे दिया गया।
नेहरू रोड का होटल
शहर की पुरानी आबादी के बीच नेहरू रोड इलाके स्थित एक पुराने मकान को तोड़कर बगैर भूउपयोग परिवर्तन कराए उसका व्यवसायिक प्रयोग किया गया। पहले वहां कोचिंग सेंटर चलाया गया, जब मुनाफा नहीं हुआ तो होटल बना लिया गया। इसके पीछे बड़ी कारगुजारी जोन अधिकारी अर्पित यादव की है। जनवाणी ने जब प्रमुखता से इस कारगुजारी की खबर प्रकाशित की और खेल के खुलासे के बाद किरकिर होते देखकर आनन-फानन में अवैध रूप से बनाए जो रहे होटल को सील कर दिया। सील लगाने वाले अर्पित यादव ने फिर वहां कभी जाकर झांक कर नहीं देखा कि क्या चल रहा है। वहां हो यह रहा था कि प्राधिकरण के भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चुका हरा जालीदार पर्दा डालकर अवैध निर्माण को पूरा करने की छूट दे दी गई। इसकी शिकायत खुद इस संवाददाता ने भ्रष्टाचार के प्रतीक बन गए जोनल अधिकारी अर्पित यादव से की थी तब भी उन्होंने इसको दिखवाने की बात कही थी, लेकिन यह अलग बात है कि उसको कभी भी ना रोका गया ना टोका गया, इसके इतर हुआ यह कि अवैध निर्माण के काम में और तेजी आ गयी। मानों कह दिया गया हो कि काम को तेजी से निपटाओं और हुआ भी वैसा ही। अब यह होटल पूरी तरह से बनकर तैयार है। उसकी ओपनिंग की तैयारी है। करीबियों का कहना है कि आने वाले नवरात्र में हर दशा में इसकी ग्रांड ओपनिंग होनी है। इतना ही यह भी संभव की मेरठ विकास प्राधिकरण के जोनल अधिकारी अर्पित यादव के अलावा तमाम सीनियर अफसर भी मौजूद हों। इस केस में जो सुनने में आया है कि जेब भी भारी थी और पहुंच भी ऊंची थी। जिनका यह अवैध इमारत है वह कभी मेरठ विकास प्राधिकरण के मुलाजिम हुआ करते थे, लेकिन इन दिनों वह गाजियाबाद में रहकर सरकार की सेवा कर रहे हैं। बकौल प्राधिकरण वीसी केस कंपाउंड कर दिया गया है। जब सवाल किया कि वहां तो पार्किंग तक नहीं रोड पर कब्जा है पहले खुद ही सील लगायी गयी सील के बाद अवैध निर्माण हुआ तो बताया गया कि सील इसीलिए लगायी जाती है कि केस को कंपाउंड किया जा सके।
किंग बेकरी कांप्लैक्स:-हमाम में सभी नंगे
पीएल शर्मा रोड स्थित किंग बैकरी वालों की अवैध इमारत जिसकी चर्चा प्राधिकरण से लेकर लखनऊ और अब हाईकोर्ट में भी हो रही है, उसको सील व ध्वस्त किए जाने के आदेश आज भी प्राधिकरण की फाइलों में महफूज हैं उसके अवैध निर्माण को आज कंपाउंड किए जाने की बात कही जा रही है। पूरे प्रदेश में यह इकलौता केस होगा जिसमें प्राधिकरण के अलावा दमकल अधिकारी, भूगर्भ विभाग, नगर निगम, प्रदूषण अधिकारी और पीवीवीएनएल के अफसर समेत तमाम विभाग जिनसे यह मामला संबद्ध के सभी भ्रष्टाचार की गंगोत्री में गोते लगाते नजर आ रहे हैं। यह कैसे हुआ यह भी बताएंगे। इस सरे खेल की शुरूआत साल 2014 से होती है, जब पहली बार यह बिल्डिंग सील हुई थी। उसके बाद इसके सात अलग-अलग मानचित्र बनाकर उसको पास कराया गया, लेकिन बजाए छह आवासीय निर्माण के वहां अवैध रूप से सत्तर दुकानें बना दी गईं। ग्यारह दुकानें महज पांच फुट की गली में भी बना दी गईं, जिसमें किसी भी दशा में दो गाड़ियां एक साथ नहीं निकल सकतीं। यह सब काम प्राधिकरण की नाम के नीचे सील लगे किया गया। इतना ही नहीं वहां बेसमेंट तक बना दिया गया। इसको लेकर जब गर्दन फंसती नजर आयी तो आनन-फानन में साल 2017 में अवैध कांप्लैक्स सील कर दिया गया। बाद में अवैध इमारत को ध्वस्त किए जाने के आदेश जारी कर दिए गए, लेकिन ध्वस्तीकरण के आदेश फाइलों से निकल कर कभी भी जमीन पर नहीं आए। भ्रष्टाचार का हरा पर्दा डाले बगैर ही किंग बेकरी का अवैध निर्माण सील का पट्टा डाले जाने के बाद भी बादस्तूर जारी रहा। यहां बता दें कि जिस कंपाउंडिंग की बात कही जा रही है उसमें पहली शर्त पार्किंग की होती है जो पीएम शर्मा रोड सरीखे बेहद संकरे व व्यस्त इलाके में आज तक भी नहीं है। इसको भी कंपाउंड किए जाने की बात खुद वीसी कर रहे हैं।
हेल्थ केयर इमेजिंग सेंटर का निर्माण
पूर्वी कचहरी मार्ग स्थित हेल्थ केयर इमेजिंग सेंटर के सामने निर्माणाधीन बिल्डिंग को लेकर भी प्राधिकरण के अफसर गहरी नींद में नजर आते हैं। यहां भी हरे पर्दे का जलवा कायम है। या यूं कहें कि हरा पर्दे है तो भी सब मुमकिन है। इस हरे पर्दे का कमाल भी इस बिल्डिंग में साफ नजर आता है। ऐसा भी नहीं कि यहां से यह बिल्डिंग काफी दूरी पर हो और मेरठ विकास प्राधिकरण में बैठे जोनल अधिकारी अर्पित यादव को नजर नहीं आ रही हो। यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि अर्पित यादव केवल जोनल अधिकारी ही नहीं बल्कि उनको प्रवर्तन का भी प्रभारी बनाया गया है। उसके बाद तो उम्मीद की जानी चाहिए की ऐसे तमाम अवैध निर्माण ध्वस्त किए जाने चाहिए, लेकिन ध्वस्तीकरण को खरीदी गई प्राधिकरण की जीसीबी केवल वहीं पर जाकर गरजती हैं जहां से कुछ मिलता नहीं है या मिलना नहीं है। ऐसा नहीं कि जेसीबी का यूज नहीं किया जा रहा है। जेसीबी का प्रतिदिन यूज हो रहा है, लेकिन केवल दूरदराज के उन इलाकों में जो साफ्ट टारगेट है और कुछ मिलना भी नहीं हैं। अर्पित यादव सुबह को जाकर वहीं पर आस्तीन चढ़कर खड़े मिलेंगे। पूर्वी कचहरी मार्ग स्थित इस बिल्डिंग को लेकर यह भी साफ कर दें कि यह बंद डिब्बे की तर्ज पर तैयार की जा रही है। फ्रंट से लेकर बैक तक कही भी स्पेस नहीं छोड़ा गया है। जो हालात बता रहे हैं उसके मुताबिक यदि कंपांड कर दिया जाता है तो हैरानी नहीं, लेकिन कंपाउंड के भी कुछ कायदे कानून है। पहला तो यह कि जितना अवैध निर्माण है उसको ध्वस्त किया या कराया जाता है। पार्किंग की जगह जरूरी है। पीछे व फ्रंट ओपन होना चाहिए, यह भी इस बिल्डंग, नेहरु रोड के होटल व पीएल शर्मा रोड स्थित किंग की अवैध बिल्डिंग में नहीं है।
यह कहना है प्राधिकरण के उपाध्यक्ष का
इस संवाददाता ने जब प्राधिकरण उपाध्यक्ष संजय कुमार मीणा से उक्त अवैध निर्माणों को लेकर सवाल किया तो उन्होंने बताया कि कंपाउंड कर दिया गया है, जब सवाल किया कि ये सभी अवैध निमार्ण प्राधिकरण की सील के बावजूद किए गए हैं तो क्या यह माना जाए कि प्राधिकरण की सील के कोई मायने नहीं तो उन्होंने जोर देकर कहा कि ये सभी केस कंपाउंड के दायरे में आते हैं, इसलिए कर दिए गए।