यूजीसी के खिलाफ क्यों हैं मीडिया – प्रशासनिक लाबी, इसलिए कर रहे हैं यूजीसी का विरोध, अशोक कुमार विश्वकर्मा ने किया बेपर्दा
नई दिल्ली। यूजीसी रेगुलेशन दलित-बहुजनों की समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई है। विश्वविद्यालयों में बहुजन छात्रों के ख़िलाफ़ गहरे और व्यवस्थित भेदभाव का प्रमुख कारण उच्च जाति के प्रशासनिक लॉबी के कारण है जो हाशिए पर पड़े वंचित वर्गों की समस्याओं के प्रति असंवेदनशील हैं और उनकी सामाजिक व शैक्षिक कठिनाइयों को गंभीरता से समझने का प्रयास नहीं करती है। यूजीसी नियमों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है, किन्तु उच्च जाति के समर्थकों और उनका साथ देने वाले मीडिया ने पूरे देश में कृत्रिम और भ्रामक माहौल बना दिया है मानो यूजीसी ने उच्च जाति के लोगों के ख़िलाफ़ भेदभाव का रास्ता खोल दिया हो, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। उच्च जातियों का एक संगठित समूह सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, यूजीसी और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हुए है।
मसला अब सुप्रीमकोर्ट में
यूजीसी मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है, जहां मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जयमाला बागची की खंडपीठ ने 29 जनवरी को यूजीसी के नियमों पर रोक लगा दी और केंद्र सरकार तथा यूजीसी से 19 मार्च तक पूरे मामले पर जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले ने वंचित समुदाय के युवाओं को घोर निराशा में डाल दिया है। अदालत के इस फ़ैसले ने इस धारणा को पुष्ट किया है कि न्यायपालिका ने आरक्षण और अन्य सामाजिक न्याय के मुद्दों पर अक्सर रूढ़िवादी और पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती है। इसने आरक्षण नीतियों और विधायिका द्वारा कमज़ोर वर्गों के लिए अनुमोदित अन्य क़ानूनों व नीतियों में कई बार बाधाएं डाली है।
सबसे बड़ा कसूरवार मीडिया
यूजीसी ने 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से संबंधित नियम अधिसूचित किए थे। यह अचानक लिए गए फ़ैसले का नतीजा नहीं है, बल्कि एक लंबे संघर्ष और अनगिनत बलिदानों का परिणाम है, लेकिन मीडिया लगातार इन सभी पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर रहा है और स्टूडियो में बैठे एंकर कथित तौर पर ‘उच्च जाति के बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़’ का आरोप लगाते हुए माहौल बना रहे हैं कि यूजीसी के नियमों को लागू करने से देश में उच्च जाति के छात्रों के साथ भेदभाव करने का ‘बहुजनों को लाइसेंस’ मिल जाएगा।
ये कैसा हिन्दुत्व जो छीनता है
हिंदुत्व से जुड़े राजनीतिक दल धर्म के नाम पर लोगों को जब लामबंद करते हैं, तो उच्च जाति के गुट को इसमें कोई राजनीति नहीं दिखती; लेकिन जब कोई ऐसी नीति सामने आती है जो वंचित और शोषित वर्गों को कुछ राहत प्रदान करती है, तो वही गुट इसे ‘वोट बैंक की गंदी राजनीति’ कहता है। समाज के शक्तिशाली गुट की संकीर्ण मानसिकता और स्वार्थपरक राजनीति के कारण ही देश के शिक्षण संस्थानों में वर्षों से जाति और समुदाय के नाम पर भेदभाव हो रहा है। दलितों, आदिवासियों, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों – विशेषकर मुस्लिम छात्रों – के साथ प्रतिदिन हो रहे भेदभाव को या तो अनदेखा करते हैं या जानबूझकर उस पर आंखें मूंद लेते हैं।
रोहित बेमुला का तुम भुला ना पाओगे
2016 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में संस्थागत हत्या का शिकार हुए रोहित वेमुला की शहादत को देश का शोषित वर्ग और न्यायप्रिय तबका कभी नहीं भूल सकता। यह सिर्फ़ रोहित की बात नहीं है; हाशिए पर पड़ा समाज पायल तड़वी के साथ हुए अत्याचारों को भी नहीं भूल सकता। गौरतलब है कि 2019 में मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज की छात्रा पायल जाति-आधारित उत्पीड़न से इतनी व्याकुल हो गई थी कि उसने आत्महत्या कर ली थी।
इनकी मौत सिस्टम पर सवाल
ये मौतें व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं, बल्कि जाति-आधारित भेदभाव और अलगाव का प्रतीक हैं, जो पूरे देश में व्यापक रूप से व्याप्त है, जबकि शोषित वर्गों के ख़िलाफ़ अत्याचार के कुछ मामले पुलिस और प्रशासन के संज्ञान में आते हैं, वहीं कई अन्य घटनाओं को आधिकारिक रिपोर्टों में शामिल किए जाने से पहले ही दबा दिया जाता है। उच्च शिक्षा संस्थानों की सामाजिक संरचना को देखने से यह समझा जा सकता है कि आज भी इन संस्थानों में उच्च जाति का वर्चस्व सबसे अधिक है, जो सदियों पुराने प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए लगातार बहुजन छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को पीछे धकेलने का प्रयास करता है।
हाशिए पर पड़े समुदायों की उपेक्षा जारी
24 जुलाई, 2025 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रोफेसर स्तर के 80 प्रतिशत पद ओबीसी के लिए, 64 प्रतिशत दलितों के लिए और 83 प्रतिशत आदिवासी श्रेणियों के लिए रिक्त हैं। इसी प्रकार, 5 दिसंबर, 2023 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय विश्वविद्यालयों से पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वाले छात्रों की कुल संख्या 13,626 है, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं। वंचित समाज के ये छात्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों और भारतीय प्रबंधन संस्थानों में पढ़ते थे। ये आंकड़े दिसंबर, 2023 में शिक्षा राज्य मंत्री सुभाष सरकार द्वारा संसद में लिखित उत्तर के माध्यम से प्रस्तुत किए गए थे। देश के प्रमुख शिक्षण संस्थाओं में हाशिए पर पड़े समुदायों की उपेक्षा जारी हैं, और नवीनतम आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण नीतियां अभी भी 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पूरी तरह से लागू नहीं की जा रही हैं।
आरक्षण के बावजूद महज चार फीसदी
ओबीसी के लिए आरक्षण दर 27 प्रतिशत निर्धारित होने के बावजूद, 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व मात्र 4 प्रतिशत तक ही सीमित है, जबकि एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के स्तर पर भी स्थिति में कोई ख़ास या ठोस सुधार नहीं हुआ है, और उनका प्रतिनिधित्व क्रमशः केवल 6 प्रतिशत और 14 प्रतिशत तक ही पहुंचता है। इसके अलावा, गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच भी ओबीसी आरक्षण की पूर्ति नहीं हो सकी है, क्योंकि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में उनके लिए केवल 12 प्रतिशत सीटें ही आवंटित की गई हैं। इतना ही नहीं, विश्वविद्यालयों में अधिकांश कुलपति, जिनके पास संस्थानों की समग्र कमान और निर्णय लेने की शक्ति होती है, उच्च जाति समुदायों से आते हैं, जबकि आदिवासी और दलित पृष्ठभूमि के कुलपतियों की संख्या ऊंगलियों पर गिनी जा सकती है। विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षण कर्मचारियों का बहुमत समाज के शक्तिशाली और विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों से आता है, जिससे संस्थानों के भीतर पूर्वाग्रह, असमानता और भेदभाव की संभावना स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
आंकड़े खोल रहे पोल
भारत सरकार ने संसद को सूचित किया कि देश के 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से कुलपतियों की संख्या केवल एक-एक और ओबीसी से सात है। इसका मतलब 36 कुलपति यानि 80 प्रतिशत उच्च जातियों से हैं। यह तथ्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि विश्वविद्यालयों में नीति-निर्माण और उच्चतम प्रशासनिक स्तरों पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी समुदायों का प्रतिनिधित्व कितना कम और अपर्याप्त है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों की कुल जनसंख्या लगभग 25 प्रतिशत है और यदि कुलपति पद पर उनका प्रतिनिधित्व जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए, तो कम-से-कम 11 कुलपति हाशिए पर स्थित समुदायों से होने चाहिए। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि उनकी संख्या केवल दो है, जो लगभग 4 प्रतिशत बैठती है और उनके संवैधानिक व लोकतांत्रिक अधिकारों से बहुत कम है। उदाहरण के लिए, यदि बस में कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, तो यह नीति न तो पुरुषों के हितों के विरुद्ध है और न ही किसी भी प्रकार से उनके साथ भेदभाव करती है। बल्कि, पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं के लिए सीटें सुनिश्चित करना सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने और लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूत करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।
उच्च जातियों का विरोध है जारी
उच्च जाति के लोग इस बात का भी विरोध कर रहे हैं कि यूजीसी के नए नियमों में झूठी शिकायतों के लिए सज़ा के संबंध में कोई स्पष्ट और सख़्त प्रावधान शामिल नहीं हैं, जिससे उन्हें काफ़ी चिंता हो रही है। विडंबना यह है कि एक ओर तो निचली जातियों के ख़िलाफ़ भेदभाव जारी है और दूसरी ओर, इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए बनाए जा रहे क़ानून का इस आधार पर विरोध किया जा रहा है कि इसमें झूठी शिकायतें दर्ज कराने वालों के लिए कठोर दंड की कोई ठोस गारंटी नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि उच्च जाति के समर्थक इन नियमों को मज़बूत करने के बजाय कमज़ोर करना चाहते हैं और इनमें ऐसा प्रावधान जोड़ने पर ज़ोर दे रहे हैं जिसके तहत वे झूठी शिकायतों के नाम पर कार्रवाई कर सकें। दूसरे शब्दों में, यह वंचित और शोषित वर्गों को डराने-धमकाने और चुप कराने तथा उन्हें अपने बुनियादी अधिकारों की मांग करने से रोकने के उद्देश्य से किया गया एक संगठित प्रयास है।
क्यों भुलाते हैं संविधान के प्रावधान
सत्ताधारी लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि भारत का संविधान स्पष्ट रूप से सामाजिक न्याय और शोषितों व दलितों के कल्याण का वादा करता है। संविधान समाज में असमानताओं को दूर करने और समानता के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण करने की बात करता है। शोषित वर्गों के लिए न्याय तभी प्राप्त किया जा सकता है जब उनके प्रति पूर्वाग्रह को समाप्त किया जाए, और पूर्वाग्रह को समाप्त करने के लिए सरकार के लिए जाति-आधारित असमानताओं को दूर करना आवश्यक है। उच्च जातियों की आबादी का संसाधनों पर सबसे अधिक नियंत्रण है। चाहे वह भूमि हो या उद्योग, शैक्षणिक संस्थान हों या सरकारी विभाग, फ़िल्म और संस्कृति की दुनिया हो या धार्मिक संस्थान आज भी उच्च जातियां अपनी सर्वोच्चता बनाए रखती हैं और समाज की बड़ी आबादी यानी दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों को उनका वाजिब हक़ देने के लिए तैयार नहीं हैं।
गुलामी की वजह तो यही है
जयोतिराव फुले से लेकर डॉ. आंबेडकर तक, वे लगातार यही दोहराते रहे कि उच्च जातियों का वर्चस्व और उनकी ‘श्रेष्ठता’ तथा शूद्रों और अतिशूद्रों की ‘गुलामी’ का मुख्य कारण यह था कि शक्तिशाली वर्ग शोषित वर्गों को शिक्षा से दूर रखते थे। हालांकिआज़ादी के बाद और आंबेडकरवादी आंदोलनों के माध्यम से दबे-कुचले वर्गों के शैक्षिक और अन्य अधिकारों के लिए बड़े संघर्ष हुए और स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के दरवाज़े उनके लिए खोले गए, मगर यह भी एक बड़ा सच है कि आज भी उच्च जाति के लोग अपने जातिगत नेटवर्क के ज़रिए अपने समुदाय के बच्चों को अच्छे अंक दिलाते हैं और उन्हें नौकरियों में मदद करते हैं, जबकि दलितों, आदिवासियों, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है और उन्हें प्रोत्साहित करने के बजाय विभिन्न तरीकों से परेशान किया जाता है।
बहुजनों को हक नहीं
बहुजन समाज को अभी तक उसका पूरा हक़ नहीं मिला है, लेकिन यूजीसी के इन नियमों का स्वागत और इनमें सुधार करने के बजाय उच्च जाति के लोग इसे-विघटनकारी बताकर देश को गुमराह कर रहे हैं। सबसे दुखद बात यह है कि अदालत भी दलित समाज के दर्द और उनके साथ हर दिन हो रहे भेदभाव को दूर करने के बजाय शोर-शराबे वाली बहसों से प्रभावित होती दिख रही है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फ़ैसले में यूजीसी के नियमों पर रोक लगा दी और कहा कि 2012 के नियम लागू रहेंगे। सामाजिक न्याय विशेषज्ञों का मानना है कि इन नियमों से उच्च जाति के लोग सबसे ज़्यादा परेशान हैं, क्योंकि पहली बार यूजीसी ने जातिगत भेदभाव का सामना करने वाले छात्रों की सूची में दलितों और आदिवासियों के साथ-साथ ओबीसी को भी शामिल किया है।
कौन फैला रहा है अफवाह
वहीं उच्च जाति के लोग यह अफ़वाह फैला रहे हैं कि ओबीसी एक ‘शक्तिशाली समूह’ है और इसे एससी और एसटी के साथ शामिल नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन सच्चाई यह है कि ओबीसी समाज के लोग आज भी शैक्षणिक संस्थानों में हर दिन भेदभाव का सामना कर रहे हैं और उनकी जनसंख्या के अनुपात में उनका प्रतिनिधित्व अब भी नहीं है। इस समस्या का प्रभावी समाधान यही है कि नीति-निर्माण और उसके कार्यान्वयन की प्रक्रियाओं में हाशिए पर पड़े समुदायों और जातियों को वास्तविक और सार्थक प्रतिनिधित्व दिया जाए। इसके साथ ही, एक मज़बूत और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए, जो प्रशासन को जवाबदेह ठहरा सके।