तो क्या दोनों अफसर आ चुके आमने सामने

kabir Sharma
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एक फाइल को लेकर क्या आमने सामने नहीं, डोर टू डोर ठेका फाइल की वजह से क्यों है यह भिड़त, दिक्कत क्या है ऑडिट कराने में

मेरठ। डोर टू डोर ठेके की महज एक फाइल को लेकर दो अफसरों में तनातनी साफ नजर आती हैं। यह समझ में नहीं आ रहा है कि जब ऑल इज वैल तो फिर “सब ठीक है” तो ऑडिट से इतना डर क्यों? या यह मान लिया जाए कि अब फाइल गायब और ₹1.5 करोड़ पर सवालों का तूफान” चल रहा है। छावनी परिषद मेरठ में डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण ठेके की फाइल को लेकर कैंट बोर्ड और CDA (Controller of Defence Accounts) के बीच अब सीधी टक्कर शुरू हो गई है। ऑडिट टीम ने फाइल मांगी, लेकिन बोर्ड ने उसे देने से साफ इनकार कर दिया। यह टकराव अब प्रशासनिक स्तर पर बड़ा विवाद बनता जा रहा है।

क्या ऐसे बचाव किया जा सकेगा

“6 महीने का ऑडिट” बनाम “पूरी फाइल” — बोर्ड का बचाव क्या पूरी तरह से असफल नहीं माना जा रहा है। बोर्ड का तर्क है — “ऑडिट सिर्फ पिछले 6 महीनों का है, इसलिए 2021-22 और 2022-23 की पुरानी फाइलें नहीं दी जा सकतीं।” लेकिन सवाल उठता है — जिस अवधि का कभी ऑडिट ही नहीं हुआ, उसे अब भी क्यों रोका जा रहा है? क्या बोर्ड को पता है कि पुरानी फाइलें खोलते ही कुछ खुलासा हो जाएगा? सीबीआई क्लीन चिट” का ढोल, लेकिन ऑडिट से परहेज क्यों किया जा रहा है। बोर्ड बार-बार दोहरा रहा है कि सीबीआई ने आरोप बेसलेस पाए हैं। कोई अनियमितता ना होने की बात कही गयी है और सब कुछ पारदर्शी है इसका भी दावा किया जा रहा है।

फिर भी वही फाइल CDA को नहीं दी जा रही

जब सब साफ-सुथरा है, तो ऑडिट से इतना डर क्यों?
विशेषज्ञों के अनुसार, ऑडिट द्वारा मांगे गए रिकॉर्ड न देना सीधे audit obstruction माना जा सकता है और यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है।

₹1.5 करोड़ के भुगतान फसाद की जड़

सूत्रों के अनुसार, यह विवादित फाइल लगभग ₹1.5 करोड़ के भुगतान से जुड़ी है। पहले भी segregation records, daily waste data और MSW Rules, 2016 के अनिवार्य दस्तावेजो की अनुपस्थिति के बिना भुगतान पर सवाल उठ चुके हैं। अब CDA ठीक उसी की गहराई से जांच करना चाहता है।

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आरटीआई के जवाब तो खुद खोल रहे हैं बोर्ड के राज

बोर्ड जिन बातों और राज को छिपाना चाह रहा है, उनको तो बोर्ड से मांगी गई आरटीआई में दिए गए जवाब राज खोल रहे हैं। एक आरटीआई में बोर्ड ने माना है कि segregation ratio, verification reports और Form III-Form VI उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी भुगतान कर दिया गया। क्या यही “सब ठीक” है?

सीधा सवाल बोर्ड से

सीडीए से तमाम फाइलों का ऑडिट कराने की पैरवी करनेवालों का कहना है कि ऑडिट का समय ीाले ही कितना ही सीमित क्यों ना हो लेकिन ऑडिट एक्सेस रोका नहीं जा सकता। इसका कोई कानून या ऐसा करने का अधिकार किसी को नहीं। जब किसी को अधिकार नहीं है तो फिर मांगी जा रही फाइलें ऑडिट के लिए दीं क्यों नहीं जा रही हैं। ऐसा क्या जो इतना घमासान मचा हुआ है फिर भी ऑडिट टीम को फाइलें दी नहीं जा रही हैं। क्या इसकी वजह अकारण नहीं।

डीजीडीई व सीवीसी तक ना पहुंच जाए कहीं मामला

एक ठेकेदार की वजह से जैसा की सुनने में आ रहा है यदि यह मामला बढ़ता है और डीजीडीई व सीवीसी तक पहुंचता है तो वो किसी के लिए भी अच्छा नहीं माना जा सकता है। जानकारों की मानेंतो अब यह मामला अब सिर्फ फाइल का नहीं रहा। अगर बोर्ड CDA को फाइल उपलब्ध नहीं कराता, तो यह DGDE, CVC और उच्च स्तर तक पहुंच सकता है। सूत्र कह रहे हैं — “बोर्ड की चुप्पी और फाइल छुपाने की कोशिश खुद एक बड़ा सबूत बनती जा रही है।”

सबसे बड़ा सवाल

दरअसल इस सारी फजीहत की जड़ कैंट बोर्ड के कुछ अफसर खुद हैं। जब सब कुछ ठीक है तो फिर छिपाने जैसी क्या बात है।“सब ठीक है” का दावा करने वाला बोर्ड CDA ऑडिट से फाइल क्यों छुपा रहा है? यह भी पूछा जा रहा है या कहें आशंका जतायी जा रही है कि क्या सच सामने आने से पहले ही फाइलें “गायब” हो जाएंगी?

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