काम कर गई ट्रंप की धमकी, ईरान को घेरने के लिए भारतीय हितों की बलि, चाबहार बंदरगाह के बेहद रणनीतिक थे फायदे
नई दिल्ली/तेहरान। यूएस की टैरिफ धमकी के चलते भारत को एक बार फिर से बैकफुट पर आना पड़ा है। इस बार अमेरिका ने भारत का बड़ा नुकसान किया है। जिस प्रोजेक्ट पर भारत अरसे से काम कर रहा था। अमेरिका की पच्चीसी फीसदी अतिरिक्त टैरिफ की धमकी के चलते उसको पीछे हटना पड़ा। यह पूरा मामला ईरान के चाबहार बंदरगाह से जुड़ा है। जिसकाे भारत ने पूरी तरह से अब छोड़ दिया है। इस फैसले को भारत की कमजोर विदेश नीति के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस ने सीधे-सीधे मोदी सरकार पर कमजोर विदेश नीति अख्त्यार करने के आरोप लगा दिए हैं। चाबहार छोड़ने से चीन और पाकिस्तान दोनों अब खुश हैं, इससे भारत का सामरिक नुकसान हुआ है।
चाबहार बाइंड डाउन
अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों के कारण भारत अपनी भागीदारी को काफी हद तक कम कर रहा है या वाइंड डाउन (समाप्ति की ओर ले जा रहा) है। भारत सरकार ने बार-बार कहा है कि चाबहार से बाहर निकलना विकल्प नहीं है, लेकिन वास्तविकता में ऑपरेशनल स्तर पर बड़े बदलाव हो चुके हैं। भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह को पूर्ण रूप से छोड़ दिया है ऐसा नहीं है, लेकिन हालिया घटनाक्रमों से यह स्पष्ट है कि यूएस की धमकी असर कर गईं।
ट्रंप ने दी थी धमकी
इस साल के शुरूआत में ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि ईरान से व्यापार करने वाले किसी भी देश पर अमेरिका 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाएगा। उम्मीद नहीं थी कि ट्रंप की यह धमकी काम करेगी, लेकिन चाबहार छोड़कर हमने यह बता दिया कि अमेरिका सुपर बॉस है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) का स्पष्ट बयान है कि “भारत चाबहार में सक्रिय है, अमेरिका के साथ वेवर को लागू करने और विस्तारित करने की बातचीत जारी है। बाहर निकलना कोई विकल्प नहीं है।” लेकिन कई स्रोतों के अनुसार, भारत चाबहार छोड़ने में ही भलाई समझी।
भारत के लिए बेहद जरूरी था चाबहार
चाबहार भारत को पाकिस्तान बाईपास करके अफगानिस्तान, मध्य एशिया तक पहुंच देता है। यह INSTC (इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर) का हिस्सा है और चीन के ग्वादर पोर्ट को काउंटर करने का माध्यम। अगर भारत पूरी तरह बाहर होता है तो यह बड़ा नुकसान होगा। ट्रंप प्रशासन ईरान पर अधिकतम दबाव नीति अपनाए हुए है। भारत-अमेरिका संबंध मजबूत हैं, लेकिन ईरान के साथ भारत के हित (तेल, कनेक्टिविटी) टकरा रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स में इसे अमेरिका के सामने झुकना बताया गया, जबकि सरकार इसे संतुलन कह रही है। कांग्रेस ने इसे इसे मोदी सरकार की “कमजोर विदेश नीति” बताया और कहा कि अमेरिका के दबाव में चाबहार छोड़ दिया। हालांकि सरकार की ओर से बातचीत के जरिये रास्ता निकालने की बात कही गयी है।