ओल्डग्रांट के बंगलों पर रइसों की नजर, कई बंगले हैं बिक चुके, खरीदने वाले नहीं पड़ते बैनामे के चक्कर में, केवल मौखिक होता है एग्रीमेंट
मेरठ। छावनी इलाके में ओल्ड ग्रांट के बंगलों की खरीद फरोख्त यानि ले बेच पर भले ही भारत सरकार की रोक हो, लेकिन उसके बाद भी ओल्ड ग्रांट के तमाम बंगलों का सौंदा किया जा रहा है। इन बंगलों के बैनामे भले ही ना हो सकते हों, लेकिन जो भी ओल्ड ग्रांट बंगलों में रूची रखते हैं वो मौखिक सौदे कर रहे हैं। और सुनने में तो यहां तक आया है कि ये सौदे लाखों में हो रहे हैं। कुछ बंगलों के सौदे तो करोड़ों में हुए सुनने में आए हैं। ओल्ड ग्रांड के तमाम बंगले भारत सरकार की संपत्ति हैं। छावनी इलाके में इनका बॉस डीईओ को माना जाता है। कुछ बंगलों का मैनेजमेंट सीईओ के अंडर है। बंगलों की यदि बात करें तो डीईओ और सीईओ के स्तर से समान रूप से लापरवाही बरती गयी है।
बिक चुके हैं तमाम बंगले
छावनी स्थति ओल्ड ग्रांट के जिन बंगलों को सौदा हो गया है या सौदा फ्लोर पर है यानि सौदे की प्रक्रिया चल रही है, तमाम लोगों को खासतौर से छावनी के आम आदमी को तो इसकी जानकारी होती है, लेकिन हैरानी इस बात की है कि इस खरीद-फरोख्त की जानकारी ना तो सीईओ को हाेती है और ना ही डीईओ को इन बंगलों के सौदों की भनक लग पाती है। सीईओ और डीईओ सरीखे कैंट के अफसरों की बात करें तो उनके यहां ज्वांइन करने से लेकर दूसरी जगह पोस्टिंग हो जाने तक ओल्ड ग्रांट के इन बंगलों की खरीद फरोख्त की भनक तक नहीं लग पाती। दरअसल भनक इसलिए भी नहीं लग पाती है क्योंकि तमाम सौंदे केवल केवल मौखिक होते हैं। माना जा रहा है कि इसी के चलते ओल्ड ग्रांट के तमाम बंगले बिक चुके हैं।
रिहायशी बंगलों में हो रहे कारोबार
डीईओ के तमाम ओल्डग्रांट के रिहायशी बंगले कारोबार के लिए प्रयोग किए जा हैं। बंंगला 210 कैसलव्यू जिसको नवाब की कोठी बोला जाता है उसमें विवाह मंडप बन गया। वेस्ट एंड रोड स्थित बंगला 213 में सब डिविजन ऑफ साइट के बाद मंदिर और दूसरी चीजें बन गयी हैं। बंगला 215 में जैन विवाह मंडप और फ्रंट पर दुकानें बन गयी हैं। बंगला 216 में चेंज ऑफ परपज के बाद दर्शन एकाडेमी खुल गयी। बंगला 216 में भी चेंज ऑफ परपज के बाद गूंगे बहरोंं का स्कूल चल रहा है। वेस्ट एंड रोड स्थित बंगला 219 का भी कारोबारी इस्तेमाल किया जा रहा है। बंगला 220 में दीवान पब्लिक स्कूल संचालित किया जा रहा है। 221 बंगले में एसएसडी स्कूल संचालित हो रहा है। 223 बंगले में जीटीबी पब्लिक स्कूल चल रहा है। 224 में चेंज ऑफ परपज के बाद नर्सरी व पेड़ पौधे बेचे जा रहे हैं। बंगला 225 में गोदाम बनाकर उसका भी कारोबारी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी तर्ज पर बंगला 227 में मेरठ पब्लिक स्कूल मेन विंग चल रहा है। 233 में एमपीएस गर्ल्स विंग चल रहा है। 225 में आरामशीने चल रही हैं। इस बंगले का भी कारोबारी इस्तेमाल किया जा रहा है। वेस्ट एंड रोड स्थित बंगला 237 में कालोनियां काट दी गयी हैं। बंगला 240 भूसा मंड़ी में कालोनी कादी दी गयी और फैक्ट्रियां लगा दी गयी हैं। भूसा मंड़ इलाके में बंगला 201 में विवाह मंडल और 202 में कालोनी काट दी गयी।
रातों रात नहीं
डीईओ के इन आवासीय बंगलों में अवैध रूप से ना तो रातों रात कारोबारी इस्तेमाल शुरू किए गए हैं। मसलन उनमें गोदाम और फैक्ट्री बना दी गयी हैं और ना ही इनमें अवैध कालोनियां रातों रात काट दी गयी हैं। यह सब कैंट अफसरों की रिहायशी बंगलों को लेकर लापरवाही का नतीजा है। हैरानी तो यह है कि पता चलने के बाद भी ओल्ड ग्रांट के इन बंगलों में कैंट एक्ट के खिलाफ किए गए कृत्यों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है। इस संबंध में जब डीईओ से पूछा गया तो उन्होंने कोई रिप्लाई नहीं दिया।