भू-माफिया की नजर DEO CEO बेखबर

kabir Sharma
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बंगला 210 बी को लेकर इस बेखबरी की चुकानी ना पड़ जाए कीमत, सुप्रीमकोर्ट के आदेश को लेकर बड़ी लापरवाही, जो होने थे ध्वस्त वहां लग गए शटर

मेरठ। छावनी का बंगला 210-बी पर सुप्रीमकोर्ट का आदेश और उस पर कैंट बोर्ड व डीईओ ऑफिस की बेखबरी इन सबसे अलग इस बंगले की बेशकीमती जमीन पर कुछ सफेदपोश व्यापारी नेताओं की शक्ल में भूमाफियाओं की नजर.. दाल में कुछ काला है या फिर सारी दाल ही काली है। यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन इस बंगले में जिन भू-माफियाें की नजर की बात सुनने में आ रही है, उन्होंने कुछ पिलरों का निर्माण 210-बी में कराया है। जिस बंगले पर सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद हर वक्त ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की तलवार लटक रही हो, उस बंगले में यदि कोई पिलर का निर्माण करा ले और कैंट बोर्ड के अफसरों को उसकी भनक तक नहीं लगे कोई माने या ना माने लेकिन बगैर किसी कारण ऐसा संभव नहीं है। यहां यह भी याद दिला दें कि पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीमकोर्ट ने इस बंगले में सभी 46 बैनाम अवैध किए बता कर उन्हें निरस्त कर दिए हैं। जो लोग इस बंगले में बैनामे कराकर रह रहे हैं, उनकी रिहाइश पूरी तरह से अवैध तो है ही साथ ही खतरे में भी है, जिस दिन चाहेगा कैंट बोर्ड और डीईओ ऑफिस उन्हें जमीदोंज कर देगा। यहां यह भी बता दें कि इस मामले में आनंद प्रकाश अग्रवाल छह माह जेल रहे, क्योंकि आनंद प्रकाश, चंद्र प्रकाश और विजय प्रकाश के खिलाफ मुकदमा दर्ज है, जबकि पुष्पा देवी की मौत हो चुकी है।

सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बाद निधि से काम पर चुप्पी क्यों

बंगला 210-बी में किए गए सभी निर्माणों को ध्वस्त किए जाने के आदेश सुप्रीमकोर्ट ने दी है। उससे पहले सुप्रीमकोर्ट ने सभी पक्षों को सुना और उसके बाद सभी निर्माणों को ध्वस्त किए जाने का आदेश दिया था। इसलिए कोई यह नहीं कह सकता कि उन्हें पता नहीं था। इतना ही नहीं सेना, कैंट बोर्ड और जिला प्रशासन ने साल 2016 में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की। यदि उस कार्रवाई में शर्मा जी नान वाले व तीन अन्य की मौत ना हुई होती तो 210-बी के तीनों काॅप्लैक्स साउथ व सैंटर भी ध्वस्त कर दिया गया होता उस दिन कार्रवाई में केवल पूर्वी जिसको आरआर मॉल का नाम दिया गया, उसे ही ध्वस्त किया जा सका। हैरानी इस बात की है कि कैंट बोर्ड और डीईओ ऑफिस तथा सब एरिया में बैठने वाले फौजी अफसरों को 210-बी का पूरा स्टेटस पता है उसके बाद भी यदि किसी जनप्रतिनिधि की निधि से इस बंगले में टाइल लगायी जा रही हैं, पक्की रोड बनायी जा रही है तो निश्चित रूप से अफसर ही इसके लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्हें इस बंगले के सभी अवैध निर्माणों को ध्वस्त किए जाने के आदेश सुप्रीमकोर्ट ने दिए हैं। जहां तक हमारी जानकारी है तो सुप्रीमकोर्ट के आदेशों का अनुपालन भले ही कोई भी महकमा क्यों ना हो, करना बेहद जरूरी होता है अन्यथा अवमानना की कार्रवाई की तलवार लटकती है।

210-बी की टाइम लाइन

बंगला 210-बी ओल्ड ग्रांट का आवासीय बंगला है। जीएलओ में यह पुष्पादेवी आदि के नाम दर्ज है। इस बंगले में 96 कोठियां हैं इसके अलावा भी कई अन्य अवैध निर्माण हैं जिनमें 210-बी के साउथ, सैंटर व पूर्वी साइड में निर्माण कोर्ट ने माने। पूर्व का निर्माण साल 2016 में ध्वस्त किया जा चुका है। साल 1994 में इस बंगले में बड़े स्तर पर अवैध निर्माण कराए गए। बताया जाता है कि उसी दौरान आनंद प्रकाश अग्रवाल ने पुष्पा देवी से अपनी पत्नी मीनू अग्रवाल ने नाम पावर ऑफ अर्टानी करा ली थी। आरोप है कि आनंद प्रकाश अग्रवाल ने 210-बी का स्टेट फ्री होल्ड बताकर वहां प्लाटिंग शुरू कर दी। तमाम लोगों ने मौके की जगह जानकार वहां प्लाट खरीदे और बाद में पक्के अवैध निर्माण भी किए। अदालत ने सभी निर्माण अवैध माने। साल 1994 में कैंट बोर्ड ने नोटिस दिए। नोटिस के खिलाफ आनंद प्रकाश अग्रवाल ने लोअर कोर्ट से स्टे हासिल कर लिया। इसके खिलाफ कैंट बोर्ड हाईकोर्ट चला गया। 19 अप्रैल 1995 में हाईकोर्ट ने कैंट बोर्ड और आनंद प्रकाश अग्रवाल को यथास्थिति बनाए रखने के आदेश जारी कर दिए, लेकिन आरोप है कि आनंद प्रकाश अग्रवाल ने हाईकोर्ट के स्टे के खिलाफ जाकर बड़े स्तर पर अवैध निर्माण कराए। साल 1995 में डीईओ ने एक मुदकमा भारत सरकार के बिहाफ पर करा दिया यह बात अलग है कि उसकी पैरवी करना बाद के डीईओ अफसर भूले रहे। हालांकि इस दौरान कैंट अफसर अवैध निर्माणों को लेकर लगातार नोटिस देते रहे। बाद में जब यह मामला सुप्रीमकोर्ट में पहुंच गया और जो एसएलपी दायर की गई थी वो भी खारिज हो गयी और ध्वस्तीकरण के आदेश दिए गए, जिसके बाद साल 2016 में कैंट अफसरों की संयुक्त कार्रवाई में 210-बी पर बड़ी कार्रवाई कैंट प्रशासन ने की थी। जो अवैध निर्माण बाकि रह गए थे, उन पर अभी जेसीबी चलनी बाकि है, लेकिन जेसीबी जहां चलनी चाहिए वहां यदि दुकानों पर शटर लग जाते हैं। कच्चे निर्माण पक्के हो जाते हैं तो सवाल डीईओ और सीईओ दोनों से सप्रीमकोर्ट पूछ सकता है।

वर्जन

इसको लेकर सीईओ कैंट व डीईओ के अलावा कैंट बोर्ड के ओएस व डीईओ आफिस के एसएसओ से उनका पक्ष जानना चाहा, लेकिन अभी कोई उत्तर नहीं मिला। यदि वो अपनी बात कहते हैं तो इतनी ही प्रमुखता से उनकी बात को स्थान दिया जाएगा।

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