
आबूलेन बंगला नंबर 180 की पार्किंग में क्या कुछ नहीं, कैंट बोर्ड के अफसर कहीं बे-खबर तो नहीं, वो सब किया जा रहा शायद जिसकी नहीं इजाजत
मेरठ। कैंट बोर्ड के सीनियर मोस्ट ऑफिशल्स और रेवेनयू सेक्शन हेड या तो बेखबर है या फिर जानबूझ कर भी अंजान बने हुए हैं। आबूलेन स्थित बंगला नंबर 180 में कैंट बोर्ड के अब तक के प्रयोग जैसे फेलियोर साबित हुए हैं लगता है कि उसी तर्ज पर पार्किंग के ठेके का प्रयोग भी पर् प्रयोगों के भांति फेलियोर साबित हाे रहा है। ऐसा नहीं कि वहां कमाई नहीं हो रही है, पार्किंग के ठेके के अलावा भी वहां कमाई के तमाम साधन नजर आ रहे हैं, लेकिन पार्किंग के अलावा जो दूसरे काम यहां नजर आ रहे हैं उसकी कमाई कैंट बोर्ड के खजाने में जमा हो रही है तो ठीक और यदि इसको ऊपर की कमाई मान लिया है तो फिर यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा कि आबूलेन बंगला 180 में पार्किंग के इतर बाकि कामों से जो ऊपर की कमाई हो रही है वो किस की जेब में जा रही है। वैसे इस तरह की कमाई आमतौर पर बांट कर ही खाई जाती है।
बंगला 180 में पार्किग के अलावा बहुत कुछ
कैंट बोर्ड ने तो बंगला 180 में केवल पार्किंग की व्यवस्था की है, लेकिन यहां पार्किंग के अलावा जो बाकि काम संविदा स्टाफ जिसके जिम्मे रेवेन्यू सेक्शन ने यह काम सौंपा है, उन्होंने इसके भीतर खाने के एक बड़ा फूड ट्रक भी खड़ा करा दिया है। इस फूड ट्रक की शोभा बढ़ाने के लिए उसके आगे ग्रीन कारपेट डाला गया है ताकि इस फूड ट्रक के प्रति ग्राहक आकर्षित हो सकें। फूड ट्रक के अलााव इसमें इंडेन गैस की गाड़ियां खड़ी की जाती हैं। अक्सर यहां इंडेन गैस सिलेंडरों के जो डिलीवरी स्टाफ के लोग है वो एक सिलेंडर से दूसरे सिलेंडर में गैस की रिफलिंग भी करते देखे जाने की बात पता चली है।
चौंकाने वाला खुलासा
तमाम बातों के अलावा जो चौंकाने वाली बात जो सुनने में आयी है वो यह कि बंगला 180 की पार्किग में संविदा स्टाफ ने कुछ गाउ़ियों को स्थाई जगह आवंटित कर दी है। यह भी सुना गया है कि प्रति गाड़ी तीन हजार रुपए लिए जाते हैं। यहां कई ऐसी गाड़ियां पार्क करायी जा रही हैं। दरअसल बंगला 180 से आबूलेन, बोम्बे बाजार, सदर आदि इलाके हैं। इन इलाकों में रहने वालो के पास लग्जरी गाड़ियां तो हैं, लेकिन उनके पास पाकिंग स्पेस नहीं है। ऐसे लोगों के लिए इस बंगले में सुविधा मुहैय्या करायी गयी है। इस प्रकार की जो गाड़ियां यहां खड़ी करायी जाती हैं, उनको किसी प्रकार की रसीन नहीं दी जाती ना ही कैंट बोर्ड के हवाले से कोई रसीद काटे जाने की बात पता चली है। जो रकम इनसे मिलती है उसको ऊपरी कमाई की श्रेणी में शामिल किया जा सकता हे। लेकिन यह ऊपरी कमाई किसी की जेब में जाती है, यह तो जांच के बाद ही पता चल सकेगा। क्योंकि सुना गया है कि इन कामों से होने वाली ऊपरी कमाई कम से कम कैंट बोर्ड के खजाने में तो जमा करायी नहीं जा रही है। यह मामला पूरी तरह से भारत सरकार को रेवेन्यू लॉस और राजस्व हानि पहुंचाने का बनता है।
कैंट बोर्ड के प्रयोग फेल हो रहे हैं या फेल किए जा रहे हैं
आबूलेन बंगला 180 कैँट बोर्ड की संपत्ति है। इसको लेकर कैंट बोर्ड के तमाम सीईओ ने कई प्रयोग किए लेकिन अभी तक एक भी प्रयोग पार्किग प्रयोग समेत सफल नहीं हुआ सुना जाता है। इस बंगले को रिज्यूम किए जाने के बाद साल 1969 में इस बंगले में फौजियों के लिए आवास बनाने का प्रस्ताव कैंट बोर्ड के तत्कालीन अफसरों ने रखा, लेकिन सिविल एरिया के बीच होने की बात कहते हुए सेना से इसको खारिज कर दिया। साल 1980 में इस बंगले में शॉपिंग मॉल व सिनेमा का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव को कैंट बोर्ड के अफसरों ने स्वीकृति के लिए कमांड को भेजा, लेकिन कमांड के अफसरों को कैंट बोर्ड का प्रस्ताव पंसद नहीं आया। नतीजा प्रस्ताव को डंप कर दिया। इसके बाद साल 2002 में कैंट बोर्ड ने फिर प्रस्ताव तैयार किया। इस बार प्रस्ताव पीपीपी ग्राउंड पर तैयार किया गया। उसमें शॉपिंग माल, दुकानें और सिनेमा का प्रस्ताव था। प्रस्ताव की जो शर्तें रखी गयी थीं उन शर्तों पर कोई तैयार नहीं हुआ। दरअसल जो तैयार थे उनकी ओर से प्रस्ताव दिया गया कि कैंट बोर्ड एक निश्चित अवधि के लिए एग्रीमेंट करें। कम से कम तीस साल का और किराया फिक्स कर ले, लेकिन प्राइम लोकेशन पर यह बंगला हाथ से निकल जाने के डर से साल 2002 का प्रपोजल भी परवान नहीं चढ़ सका। उसके बाद साल 2015 में जब सीईओ डीएन यादव थे तब उनके कार्यकाल में तय किया गया कि इसमें विवाह मंडप बना दिया जाए। यह विवाह मंडप समाज के गरीब तबके के लोगों के लिए जो महंगे विवाह मंडप का खर्चा नहीं उठा सकते, उनके लिए तैयार किया गया। लेकिन फेल इसलिए हो गया क्योंकि रेवेन्यू के जिन अफसरों को यह जिम्मेदारी दी गयी थीउन्होंने काम में कोई रूची नहीं दिखाई नतीजतन मेरठ की सबसे प्राइम लोकेशन होने के बाद भी विवाह मंडप से कमाई का जरिया परवान नहीं चढ़ सका। अब यहां पर पार्किग से कमाई की सोची है सो जिन संविदा कर्मचारियों को यहां लगाया गया है वो कैंट बोर्ड का खजाना भर रहे हैं या अपनी जेब ये तो कैंट बोर्ड ही बता सकता है।