डीएलसी की जांच, शासन, आयोग व कोर्ट के आदेश, मगर सुनने को तैयार नहीं अफसर, अवैध बताए जाने के बाद भी निगम में जारी है ठेकेदारी प्रथा
मेरठ। शासन और कोर्ट के तमाम आदेशों तथा डीएलसी की जांच में नगर निगम में ठेकेदार प्रथा को गैर कानूनी बताए जाने के बाद भी निगम प्रशासन के अफसरो ं का मूड ठेकेदारी प्रथा को खत्म करने का नहीं दिखता है। यदि ठेकेदारी प्रथा को समाप्त कर दिया जाए तो हजारों सफाई कर्मचारियों से किया जा रहा अन्याय समाप्त हो सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। नगर निगम में सफाई कर्मचारियों के संगठन इसको लेकर शासन में अपनी पैरवी लगातार जारी रखे हैं। हिन्द मजदूर सभा जिला काउंसिल भी इनमें से एक है।
आदेशों पर गंभीर नहीं निगम
सुप्रीमकोर्ट और शासन के स्पष्ट आदेश हैं कि नगर निगमों सरीखे स्थानीय निकायों में सफाई कार्य जैसा कार्य की जो प्रवृत्ति व स्वरूप है उसको ठेके पर नहीं कराया जा सकता। उसको करने वाले कर्मचारी स्थायी होने चाहिए। नगर निगम मेरठ की सफाई व्यवस्था औधोगिक प्रतिष्ठान की परिभाषा में आती है, जहां श्रम कानून लागू होते हैं, औधोगिक विवाद अधिनियम, कांट्रेक्ट लेबर (रेगुलेशन एंड एबोलिशन) एक्ट, बोनस एक्ट और वेजिज एक्ट लागू होते हैं। हिन्द मजदूर सभा के जिला मंत्री विनेश विद्यार्थी का कहना है कि लेकिन नगर निगम मेरठ, श्रम कानूनों से अनजान बनकर, श्रम कानूनों का धड़ल्ले से उल्लंघन कर, सफाई श्रमिको का उत्पीड़न करता आ रहा है, जो उत्पीड़न चरम पर पहुंच गया है।
डीएलसी की जांच के बाद भी सुप्तावस्था
नगर निगम मेरठ मेें सफाई कर्मचारियों को लेकर श्रमउपायुक्त की जांच रिपोर्ट में ठेकेदारी प्रथा को शत प्रशित अवैध बताए जाने के बाद भी नगर निगम के अफसर सुप्तावस्था में नजर आते हैं। डीएलसी की जांच में रिपोर्ट में कहा गया है कि नगर निगम के प्रबंधकीय अधिकारी/ नियोक्ता, गैर कानूनी ठेकेदारी पर सवारी कर रहे हैं। डीएलसी की जांच रिपोर्ट शासन के सक्षम अधिकारियों को भी समय-समय पर भेजी जा चुकी है।
करना था नियमित
शासन से 5 जुलाई 1977 में ज़ारी आदेश के अनुसार में एवजीदार/ दैनिक वेतन भोगी सफाई कर्मियों को वरिष्ठता क्रम में सूचीबद्ध कर उन्हें नियमित रिक्त पदों पर समायोजित/नियुक्त कर दिया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हिन्द मजदूर सभा के जिला मंत्री विनेश विद्यार्थी बताते हैं कि हाईकोर्ट प्रयागराज द्वारा याचिका संख्या 421/1990 के संदर्भ में, 25 फरवरी 1991 में आदेश पारित किए गए थे, जिन आदेश का नगर निगम मेरठ द्वारा गब्बर सिंह बनकर उल्लंघन किया जा रहा है, नगर निगम मेरठ के गब्बर सिंह बने प्रबंधकीय अधिकारियो को प्रतिनिधि यूनियन द्वारा अनेकों बार प्रतिवेदन प्रस्तुत किए गए किंतु नगर निगम मेरठ द्वारा उल्लिखित बिंदुओं को इग्नोर/ अदृश्य कर दिया गया। ऐसे में सफाई कर्मचारियों का भला कैसे हो सकता है, जब जिन्हें भला करना है वो अफसर ही बुरा करने पर उतारू हो जाएं।
आयोग, शासनदेश, हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी इंसाफ का इंतजार
श्रम कानूनों के खिलाफ शासनदेश, केंद्र सरकार का सफाई आयोग और हाईकोर्ट के आदेशों के बाद भी निगम के सफाई कर्मियों को उनका जायज हक नहीं मिल पा रहा है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग भारत सरकार द्वारा नगर आयुक्त नगर निगम मेरठ को दस दिवस में कार्यवाही करने के लिए एक निर्देश पत्र भी लिखा गया था, जिस पत्र पर कार्यवाही नहीं की गई, जिससे स्पष्ट है कि नगर निगम मेरठ में श्रम कानूनों का वायलेशन, शासनादेश और हाईकोर्ट के कंटेंम्प्ट आर्डर का वायलेशन करना एक रवायत बन गई है, जिसकी जद में अनुसूचित जाति के विशेषकर सफाई कर्मियों प्रति गहरी वैमनस्यता भी छिपी है। विनेश विद्यार्थी का आरोप है कि निगम में कर्मचारियों को को उपजातिगत चश्में से देखा जाता है। उदाहरण के तौर पर नगर निगम गैर सफाई कर्मियों को (लिपिक, ड्राइवर, अर्दली , चपरासी बनाया गया है) नियम विरुद्ध नियमित किया गया किंतु सफाई कर्मियों को विनियमितिकरण विषयक शासनादेशों के फलस्वरूप, हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद, पक्का/नियमित करने से परहेज किया गया है। अधिकारियो द्वारा 2 शासनादेशों की $गलत व्याख्या कर, दशकों से सफाई व्यवस्था में नियोजित सफाई कर्मियों को गैर कानूनी ठेकेदारी की दल दल में धकेल दिया गया।
शासनादेश, संख्या 166 एम/नौ -7-15-21(मेरठ)/2015 दिनांक 29 अप्रैल 2015 की $गलत व्याख्या कर दशकों से, सफाई कर्मियों के शासन द्वारा स्वीकृत पदों पर भर्ती हुए सफाई कर्मियों को, गैर कानूनी ठेकेदारी में नियोजित दर्शाकर, उनके भविष्य के हित लाभ ख़त्म कर दिए हैं, जब कि उल्लिखित शासनादेश, सफाई कर्मियों पर लागू ही नहीं होते हैं। हाईकोर्ट प्रयागराज , शासन और राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग भारत सरकार द्वारा समय-समय पर स्पष्ट कर किया गया है कि उल्लिखित शासनादेशों का $गलत मतलब निकाल कर स$फाई वर्कर्स के भविष्य को बर्बाद किया गया है, फलस्वरूप प्रबंधकीय अधिकारियो को, शासनादेश, हाईकोर्ट के आदेश, श्रम कानूनों के अनुपालन न करके, की गई त्रुटि में कोई सुधार नहीं किया गया, जो कायदे कानून नहीं भाते, उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। बस अपने मनमाफिक कायदे कानून ही पसंद है, जिसे हिटलरशाही भी कहा जाता है।