जहरीला हो सकता है मत खाओ

kabir Sharma
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अरसे से नहीं की जा रही जांच, फूड सेफ्टी को लेकर बेखबर हैं कैंट अफसर, शाम ढलते ही सज जाते हैं बाजारों में ठेले

मेरठ। कैंट के वाशिंदे हैं और चांट पकौड़ी के शौकीन भी तो चांट पक्रौड़ी का जो दौना हाथ में थामा हुआ है उसको तुरंत डस्टबिन में फैंक दें, क्योंकि इस बात की गारंटी नहीं है जो आप खा रहे हैं वो फूड सेफ्टी मानकों पर खतरा उतरता है। ये आशंका इसलिए व्यक्त की जा रही है क्योंकि ठेलों पर बिकने वाले खाने के इस तरह के सामान की जांच करना कैंट अफसर भूले बैठे हैं। इसलिए खाने से पहले यह तय कर लें कि जो खा रहे हैं वो फूड एंड सेफ्टी के मानकों पर खरा उतरता है या नहीं।

आम जन ही नहीं आर्मी पर्सन भी हैं रहते

मेरठ के छावनी इलाके में केवल सिविलयन ही नहीं बल्कि आर्मी पर्सन की फैमली भी रहती हैं। वो भी सिविलियन की तरह से खाने के शौकीन होते हैं लेकिन जो चौराहों व बाजारों में ठेलों पर बेचा जा रहा है क्या वो इतना शुद्ध है कि उसके खाने से कोई साइड इफैक्ट या कहें सेहत को खतरा नहीं होगा। छावनी क्षेत्र में सदर, बोम्बे बाजार, आबूलेन, लालकुर्ती, गंज बाजार सरीखे तमाम इलाकों में सड़क किनारे सजे ‘ढावों-ढेलों’ (छोटे-मोटे ढाबे और ठेलों) पर बिकने वाले खाने के सामान की जांच का नामोनिशान नहीं! फूड सेफ्टी को लेकर अफसरों की ‘बेखबरी’ से कैंट बोर्ड पर ‘स्वास्थ्य हादसे’ का खतरा मंडरा रहा है। याद रहे कि बीते दिनों रविन्द्रपुरी में दूषित पेयजल के सेवन से दो दर्जन से ज्यादा को कैंटोनमेंट हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा था। सीईओ को खुद मौके जा जाकर मुआयना करना पड़ा था।

छावनी के व्यस्त चौराहों पर, जैसे सदर बाजार और लाल कुरटी रोड, सैकड़ों ठेले और छोटे ढाबे रोजाना हजारों लोगों को चाट, समोसे, बिरयानी और लस्सी परोसते हैं। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, इनकी कोई फूड सेफ्टी जांच नहीं हो रही! जो ये सामान बेच रहे हैं नाम न छापे जाने की शर्त पर वो बताते हैं कि जिस बाजार में ये ठेले लग रहे हैं वहां के व्यापारी नेता और “कैंट बोर्ड के अधिकारी तो लाइसेंस के नाम पर चंदे वसूलते हैं, लेकिन शुक्र है कि वो कभी खाने के सामान के सेंपल की जांच नहीं कराते बल्कि अपने घर परिवार के लिए पैकिंग कराकर ले जाते हैं।

कहां है क्यू आर कोड लगवाने वाले अफसर

कांवड़ यात्रा के दौरान सिस्टम चलाने वाले अफसरों ने होटल व ढावों पर क्यूआर कोड लगवाए थे, कांवड़ खत्म तो ड्यूटी भी क्या खत्म हो गयी। बताया जाता है कि कैंटोनमेंट बोर्ड जो डिफेंस एस्टेट सर्विस के तहत चलता है, फूड सेफ्टी मामलों में एफएसएसआई से ‘समन्वय’ करने की बजाय ‘अनदेखी’ का रवैया अपना रहा है। हाल ही में फूड सेफ्टी ‘ऑन व्हील’ लैब की शुरुआत हुई, जो 10 मिनट में खाने की मिलावट पकड़ लेती है, लेकिन कैंट के इन ‘खुले रसोईघरों’ तक ये ‘चलित लैब’ पहुंची ही नहीं!

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यह होना चाहिए

विशेषज्ञों का कहना है कि कैंट बोर्ड को FSSAI के साथ ‘जॉइंट टास्क फोर्स’ बनानी चाहिए। साथ ही, हर ठेले पर QR कोड अनिवार्य हो, जैसा कांवड़ यात्रा में किया गया। अगर नहीं, तो ये ‘ढावों-ढेलों’ से निकलने वाला ‘मिलावटी भोजन’ सेना के जज्बों को भी ‘हिलाने’ लगेगा! ढाबों-ढेलों’ पर बिकते खाने का ‘मिलावटी तड़का’, ‘ फूड सेफ्टी अफसरों की ‘नजरबंदी’ से कैंट बोर्ड पर सवालों का ‘भोज’!

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