बाजारों में खडे होने वाले ठेले वालों से भी हफ्ता वसूली, ट्रेफिक जाम कराने का छूटता है ठेका
मेरठ/ शहर के तमाम प्रमुख बाजारों में दुकानों का सामान सड़कों पर रखवाने और बाजार में चांट पकौड़ी के ठेले खडे कराने के ठेके छोडे जाते हैं। आबूलेन, बोम्बे बाजार, सदर, कंकरखेड़ा क्रासिंग, रोहटा रोड समेत शहर के दूसरे बाजारों में भी ऐसे ठेके छोडेÞ जाते हैं। भले ही इनकी वजह से बाजारों से निकला दुश्वार हो जाए लेकिन इससे ना तो इलाके के थाने ना ही अधिकारियों और ना ही बाजार के व्यापार संघ के नेताओं को कोई सरोकार है। बाजारों में दुकान का सामान सड़क पर और बाजार में खडेÞ होने वाले खाने पीने के सामान के ठेले खडेÞ कराकर कुछ ने नियमित कमाई का जरिया बना लिया है। यह हाल फिलहाल में नहीं हो रहा है। यह रिवाज काफी पुराना है, लेकिन अब यह रिवाज बाजारों के यातायात के लिए मुसीबत बन गया है। हालांकि अब तो त्यौहारी सीजन है, इसलिए बाजारों में सजावट व दुकान का सामान रास्ते पर तमाम व्यापारी रख लेते हैं, लेकिन यदि त्यौहारी सीजन ना भी हो तो भी शहर में तमाम ऐसे बाजार हैं, जहां दुकानों का सामान सड़क पर रखवाने व बाजारों में खाने पीने के सामान के ठेले खडेÞ कराने का ठेका छूटता है।
ऐसे होता है काम
आबूलेन, सदर बाजार, चौक फुव्वारा, बोम्बे बाजार, जीरो माइल्स चौराहा, सेंट्रल मार्केट, शारदा रोड, कंकरखेड़ा क्रासिंग, रोहटा रोड सरीखे तमाम ऐसे बाजार हैं जहां शाम के वक्त चांट पकौड़ी या फिर खाने के ऐसे ही सामानों के दुकाननुमा ठेले थोड़ी-थोड़ी दूरी पर देखने को मिल जाएंगे। इस तरह के जितने भी ठेले खडेÞ होते हैं, उनसे जो भी रकम तय होती है वो हफ्ते के हिसाब से वसूल की जाती है। नाम न छापे जाने की शर्त पर आबूलेन चौक फुव्वारा पर खाने के सामान का ठेला लगाने वाले ने बताया कि दो सौ रुपए रोज देने के बाद ही यहां ठेला लगा पाता है। इस दो सौ रुपए के बाद पुलिस, कैंट बोर्ड व नगर निगम तथा संबंधित बाजार के व्यापारी नेताओं का झंझट खत्म। यह रकम कौन लेता है जब यह सवाल किया तो उसने बताया कि यहां जितने भी ठेले खडेÞ होते हैं, उनमें से एक ठेले वाला हफ्ते के हफ्ते यह रकम जमा कर जो भी बाजार का बड़ा नेता या फिर इलाके का नेता होता है, उसको पहुंचाता है। जो रकम जमा करता है, उसको पैसे ना देने की छूट होती है। यह इस बात की बानगी भर है कि बाजारों में कैसे ठेके छोडेÞ जाते हैं। इस शख्स से यह भी बताया कि बाजार के नेताओं की मर्जी के बगैर एक भी किसी भी प्रकार का ठेला खड़ा नहीं हो सकता। केवल यहां ही नहीं पूरे शहर में यह रिवायत है। शहर के जितने भी प्रमुख बाजार हैं जहां शाम के वक्त लोग बड़ी संख्या में खाने पीने आते हैं जैसे जीमखाना का चांट बाजार व सूरजकुंड के सामने लगने वाला चांट बाजार, सभी जगह एक ठेले वाला ठेकेदार बना दिया जाता है वो सभी से पैसे जमा करता है।
लगता है भयंकर जाम
दुकानों का सामान सड़कों व ठेलों के खडेÞ होने से बाजार में भयंकर जाम लगता है। त्यौहारी सीजन के बगैर भी शहर तो छोड़िये जो आउटर के इलाके माने जाते हैं जैसे कंकरखेड़ा क्रासिंग व रोहटा रोड वहां भी शाम के वक्त गाड़ी से निकलने में पसीने छूट जाते हैं। पुलिस वाले बाजार में नजर तो आएंगे, लेकिन जिनकी वजह से जाम लग रहा होता है उन्हें छेड़ेंगे बिलकुल नहीं। ऐसा लगता है मानों उनकी हिफाजत के लिए ही खडे हों।